टमाटर की लाल पहचान और हाशिए पर खड़े किसान

मुहम्मद अयूब कटारिया, कुपवाड़ा, कश्मीर

कश्मीर की वादियों को लोग उनकी खूबसूरती, बर्फ़ से ढकी चोटियों और हरे-भरे मैदानों के लिए जानते हैं। लेकिन इन वादियों की असली पहचान केवल पर्यटन या प्राकृतिक नज़ारों में ही नहीं, बल्कि यहाँ की मिट्टी और मेहनतकश किसानों की कहानी में भी छुपी है। इसी कहानी का एक अहम हिस्सा है हचमरग, जो जिला कुपवाड़ा की तहसील हंदवाड़ा से करीब पैंतीस किलोमीटर की दूरी पर जंगलों के बीच बसा एक छोटा सा सीमावर्ती गाँव है। गाँव छोटा है, लेकिन इसकी पहचान बड़ी है टमाटर की खेती। यहाँ की आबादी मुख्यतः गुर्जर बिरादरी से जुड़ी है और इनमें भी बड़हाना गोत्र के लोग ज़्यादा हैं। स्थानीय लोग गर्व से बताते हैं कि पीढ़ियों से टमाटर उनकी ज़िंदगी का हिस्सा रहा है।

सदियों पुरानी परंपरा।

हचमरग के बुज़ुर्ग बताते हैं कि यहाँ टमाटर की खेती सदियों से हो रही है। पहले के समय में किसान देसी टमाटर उगाते थे, जिनका इस्तेमाल केवल घर की ज़रूरतों के लिए होता था। इन टमाटरों का स्वाद और खुशबू अलग ही होती थी, लेकिन बाज़ार तक पहुँचने का कोई रास्ता नहीं था। स्थानीय किसान खुर्शीद अहमद बड़हाना बताते हैं कि“हमारे बुज़ुर्ग कहते थे कि यह ज़मीन टमाटर के लिए ही बनी है। पहले हम सिर्फ घर के लिए उगाते थे, लेकिन वक्त के साथ जब नई तकनीक और नए बीज आए तो हमने भी हाइब्रिड टमाटर लगाना शुरू किया। अब हमारी पूरी खेती इन्हीं पर निर्भर है।” आज हचमरग के हर खेत में लाल-लाल टमाटर लहराते हैं। यह केवल फ़सल नहीं, बल्कि गाँव की पहचान बन चुका है।

किसानों की सबसे बड़ी चिंता।

खेती का सबसे बड़ा आधार है पानी। लेकिन हचमरग के किसानों की सबसे बड़ी मुश्किल भी यही है। गाँव में कोई स्थायी सिंचाई व्यवस्था नहीं है। बारिश पर निर्भर रहना पड़ता है और गर्मियों में खेत सूख जाते हैं। मुनीर अहमद बड़हाना बताते हैं कि “हमारी पैदावार बहुत अच्छी हो सकती है, लेकिन पानी की कमी हमें पीछे धकेल देती है। अगर सरकार पानी की व्यवस्था कर दे, तो यह गाँव सिर्फ कुपवाड़ा ही नहीं, पूरे कश्मीर का टमाटर केंद्र बन सकता है।” गाँव वाले मानते हैं कि पानी की उपलब्धता होने पर हज़ारों टन टमाटर पैदा हो सकते हैं। लेकिन अभी यह सपना अधूरा है।

मेहनत का सही दाम कहाँ?

खेती करने के बाद अगली चुनौती है पैदावार को बाज़ार तक पहुँचाना। लेकिन पूरे कुपवाड़ा ज़िले में टमाटर या सब्ज़ियों की कोई स्थायी मंडी नहीं है। किसान मजबूरन अपनी फ़सल को औने-पौने दामों में बेचते हैं। खुर्शीद अहमद कहते हैं कि “हम मेहनत से फसल उगाते हैं, लेकिन बेचने के लिए कोई जगह नहीं। अगर कहीं ठेला लगाएँ तो दुकानदार या नगरपालिका वाले हटा देते हैं। प्रशासन को हमारे लिए जगह तय करनी चाहिए ताकि हम भी अपनी मेहनत का सही दाम पा सकें।” यह समस्या केवल किसानों के लिए नहीं बल्कि उपभोक्ताओं के लिए भी है। अगर मंडी बने, तो लोग सीधे किसानों से ताज़ा और सस्ती सब्ज़ियाँ खरीद सकते हैं।

ज्ञान की कमी और नुकसान।

खेती केवल मेहनत नहीं, बल्कि ज्ञान और तकनीक की भी माँग करती है। लेकिन हचमरग के किसानों तक यह ज्ञान समय पर नहीं पहुँचता। एक स्थानीय किसान बताते हैं कि “हम अक्सर समय पर दवाई नहीं डाल पाते। कई लोग दवाइयाँ खरीदने की ताक़त नहीं रखते। नतीजा यह होता है कि 30 प्रतिशत तक फसल बर्बाद हो जाती है।” अगर कृषि विभाग समय पर मार्गदर्शन दे, तो किसान इस नुकसान से बच सकते हैं।

खेतों से घर तक महिलाओं की भूमिका।

हचमरग की कहानी केवल पुरुष किसानों की नहीं है। यहाँ की महिलाएँ भी खेतों में बराबरी से काम करती हैं। बीज बोने से लेकर फसल तोड़ने और घर की ज़रूरतें पूरी करने तक, हर जगह उनका योगदान है। गाँव की एक महिला ने हँसते हुए कहा कि “अगर औरतें खेतों में न हों, तो टमाटर की खेती अधूरी रह जाएगी।” लेकिन उनके योगदान को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। कृषि नीतियों में महिलाओं की भूमिका पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी है।

युवाओं के लिए अवसर।

टमाटर की खेती हचमरग के युवाओं के लिए रोज़गार का नया रास्ता बन सकती है। अगर सरकार पानी और मंडी की व्यवस्था करे, तो कई युवा रोज़गार के लिए शहरों का रुख़ करने की बजाय गाँव में ही काम कर सकते हैं। स्थानीय शिक्षक इरफ़ान बड़हाना कहते हैं कि “हमारे बच्चे खेतों से दूर जा रहे हैं। अगर खेती को आधुनिक बनाया जाए, तो यही बच्चे खेती को रोज़गार बना सकते हैं।”

टमाटर से आगे संभावनाएँ।

हचमरग की ज़मीन सिर्फ टमाटर के लिए नहीं बल्कि अन्य सब्ज़ियों के लिए भी अनुकूल है। यहाँ आलू, गोभी, मटर और यहाँ तक कि औषधीय पौधों की खेती भी हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यहाँ कृषि अनुसंधान केंद्र या डेमोंस्ट्रेशन फार्म बने, तो किसान नई-नई तकनीक सीख सकते हैं और पैदावार कई गुना बढ़ सकती है।

प्रशासन और नीति की भूमिका।

किसानों की बात साफ़ है कि उन्हें पानी, मंडी और मार्गदर्शन चाहिए। इसके लिए ज़रूरी है कि जिला प्रशासन और कृषि विभाग एक ठोस योजना बनाए।

  1. सिंचाई परियोजना – नहरों या ट्यूबवेल से पानी की आपूर्ति।
  2. स्थायी मंडी – किसानों के लिए विशेष जगह जहाँ वे सीधे अपनी पैदावार बेच सकें।
  3. प्रशिक्षण और मार्गदर्शन – आधुनिक खेती के तरीके, समय पर दवाइयाँ और बीज।
  4. सहकारी समितियाँ – किसानों को संगठित कर बाज़ार तक पहुँच दिलाना।

अगर ये कदम उठाए जाएँ तो हचमरग की कहानी पूरे ज़िले की तस्वीर बदल सकती है।

उम्मीद की लाल चमक।

हचमरग की कहानी केवल एक गाँव की नहीं है, बल्कि यह पूरे ग्रामीण कश्मीर की तस्वीर है। यह तस्वीर बताती है कि मेहनतकश किसान कैसे अपनी ज़मीन से सोना उगाते हैं, लेकिन सुविधाओं की कमी उन्हें पीछे धकेल देती है। टमाटर की लाल चमक हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि अगर पानी, मंडी और तकनीक की उपलब्धता हो तो यह गाँव कृषि विकास की मिसाल बन सकता है। यह केवल किसानों का सपना नहीं, बल्कि पूरे इलाके के विकास की उम्मीद है।