काग़ज़ी वादों में कैद वारसन–गुजरान की तालीम

मोहम्मद अय्यूब कटारिया, वारसन, कुपवाड़ा, कश्मीर
उत्तर कश्मीर का ज़िला कुपवाड़ा, श्रीनगर से लगभग 90 किलोमीटर दूर, प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है। बर्फ़ से ढकी पहाड़ियाँ, हरे-भरे जंगल और शांत वादियाँ यहाँ के वातावरण को जन्नत सा बना देती हैं। लेकिन इस सुंदरता के पीछे एक सच्चाई छिपी है। यहाँ शिक्षा का स्तर बेहद निचले पायदान पर है। गाँव वारसन–गुजरान की कहानी इसका ज्वलंत उदाहरण है। यहाँ के बच्चे आज भी बेहतर शिक्षा से वंचित हैं, जबकि माता-पिता की सबसे बड़ी ख्वाहिश यही है कि उनके बच्चे पढ़-लिख कर समाज में अपनी जगह बनाएँ।
स्कूल खुले, पर सपनों में दरार
कुछ साल पहले सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान (SSA) के तहत गाँव-गाँव स्कूल खोलने की घोषणा की। इसी कड़ी में वारसन–गुजरान के तीन इलाक़ों—चक मोहल्ला, नारपती और गबरवाड़ी—में प्राथमिक स्कूल खोले गए। शुरुआत में गाँववालों की उम्मीदें आसमान पर थीं। उन्होंने अपने बच्चों को दाख़िला दिलाया और सोचा कि सदियों से जिस रोशनी से वे दूर रहे, अब वो उनके घरों में पहुँचेगी।
गबरवाड़ी के किसान मोहम्मद रमज़ान गुजर याद करते हैं कि “हमने अपने बच्चों का नाम स्कूल में लिखवाया तो सोचा था कि अब उनकी ज़िंदगी बदल जाएगी। लेकिन हालात पहले जैसे ही हैं। एक ही मास्टर है, वो भी कई बार नहीं आते। बच्चों का भविष्य कौन सँभालेगा?”
चक मोहल्ला स्कूल की स्थिति और भी मार्मिक है। यहाँ दो शिक्षक तैनात थे। दुर्भाग्य से उनमें से एक कैरण जाते हुए सड़क हादसे में चल बसे। अब करीब 78 बच्चे सिर्फ़ एक ही शिक्षक पर निर्भर हैं। अगर वो बीमार पड़ जाएँ या रास्ता बंद हो जाए, तो स्कूल ही बंद हो जाता है।
एक कमरे की तंग दुनिया

वारसन–गुजरान के स्कूलों के हालात देखकर यह विश्वास करना कठिन है कि यह 21वीं सदी का भारत है। बच्चों को एक छोटे से कमरे में ठूँस दिया जाता है। न खेल का मैदान है, न शौचालय। नई इमारत का निर्माण अधूरा पड़ा है। आयशा बी, एक स्थानीय माँ, गुस्से और निराशा के बीच कहती हैं। कि “हम बेटियों को पढ़ाना चाहते हैं, लेकिन जब स्कूल में शौचालय ही नहीं है, तो हम कैसे भेजें? बेटियाँ बड़ी हो रही हैं, हमें चिंता होती है।”
बच्चों की मासूम आवाज़
गबरवाड़ी का 13 वर्षीय फ़ैज़ान सफ़ेद शलवार-कमीज़ में स्कूल बैग टाँगे खड़ा कहता है कि “मैं डॉक्टर बनना चाहता हूँ। लेकिन यहाँ पढ़ाई ठीक से नहीं होती। एक दिन क्लास होती है, तीन दिन मास्टर नहीं आते। हमें डर है कि सपना अधूरा रह जाएगा।”
उसी स्कूल की चौथी कक्षा में पढ़ने वाली शबनम बताती है कि “जब मास्टर जी आते हैं, तो हम सब एक ही कमरे में बैठकर पढ़ते हैं। कभी हमें बैठने की जगह भी नहीं मिलती।”
अधिकारियों के बयान और हक़ीक़त
जब हमने ज़ीईपीओ करालपोरा से इस बारे में बात की, तो उन्होंने कहा कि “सालाना परीक्षा के बाद यहाँ एक स्थायी शिक्षक की नियुक्ति की जाएगी। बच्चों को परेशानी नहीं होगी।” जबकि ज़िला प्लानिंग ऑफ़िसर का भी यही दावा है कि इमारत का काम जल्द पूरा होगा और शौचालय के लिए नया टेंडर जारी किया जा चुका है।
लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि ये वादे पिछले कई वर्षों से सुनते आ रहे हैं। गाँव के बुज़ुर्ग गुलाम रसूल कहते हैं। कि “हमने अपने जीवन में कई बार अधिकारी आते-जाते देखे। सब कहते हैं ‘काम होगा, काम होगा’, लेकिन बच्चे अब भी एक कमरे में बैठे हैं।”
शिक्षा संकट की गहराई

यह समस्या सिर्फ़ वारसन–गुजरान तक सीमित नहीं है। कुपवाड़ा और आसपास के ग्रामीण इलाक़ों में शिक्षा की स्थिति चिंताजनक है।
कुपवाड़ा ज़िले की साक्षरता दर महज़ 66.9% है, जो राष्ट्रीय औसत से काफ़ी कम है।
एएसईआर 2022 रिपोर्ट के अनुसार जम्मू-कश्मीर में केवल 58.4% बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं।
कई बच्चे पाँचवीं कक्षा तक पहुँचने के बाद भी बुनियादी गणित और पढ़ाई-लिखाई में पिछड़ जाते हैं।
भारत सरकार ने कुपवाड़ा को शैक्षिक रूप से पिछड़े ज़िलों में शामिल किया है।
इन आँकड़ों से साफ़ है कि समस्या व्यक्तिगत स्कूलों की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की है।
चुनौतियाँ क्यों बनी रहती हैं?
विशेषज्ञ मानते हैं कि पहाड़ी इलाक़ों में शिक्षा की समस्याएँ तीन बड़ी वजहों से लगातार बनी हुई हैं।
शिक्षकों की कमी और अनुपस्थिति – दूर-दराज़ के इलाक़ों में शिक्षक लंबे समय तक टिकना नहीं चाहते।
बुनियादी ढाँचे की खामियाँ – अधूरी इमारतें, शौचालय और पानी की कमी, बच्चों और खासकर लड़कियों को प्रभावित करती हैं।
निगरानी की ढील – प्रशासन की तरफ़ से स्कूलों की नियमित मॉनिटरिंग नहीं होती।
क्या होना चाहिए?

हर स्कूल में कम से कम दो स्थायी शिक्षक हों।
अधूरी इमारतें तुरंत पूरी की जाएँ।
लड़कियों के लिए अलग शौचालय और सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित किया जाए।
नियमित आधार पर निरीक्षण दल बनाए जाएँ।
ग्रामीण इलाक़ों में पढ़ाने वाले शिक्षकों को विशेष प्रोत्साहन (इंसेंटिव) दिया जाए।
निष्कर्ष
वारसन–गुजरान का स्कूल सिर्फ़ एक गाँव की कहानी नहीं है। यह कहानी बताती है कि कश्मीर के हज़ारों ग्रामीण इलाक़ों में शिक्षा का सपना अभी अधूरा है। बच्चों की मासूम आँखों में भविष्य की चमक तो है, लेकिन सवाल यही है कि क्या सरकार और समाज मिलकर इस रोशनी को हक़ीक़त में बदल पाएँगे? आज ज़रूरत है कि काग़ज़ी वादों से आगे बढ़कर सच्चे अर्थों में शिक्षा की किरण हर घर तक पहुँचाई जाए। वरना यह पीढ़ी भी वही कहेगी कि “हमने सपने तो देखे थे, लेकिन पूरे कभी न हो सके”।