उम्मीदों और चुनौतियों के बीच स्वास्थ्य शिविर का आयोजन।

अनीस आर खान, नई दिल्ली
22 सितंबर 2025 की सुबह दिल्ली के ओखला में स्थित ख़लीउल्लाह मस्जिद के निकट बड़ा बारात घर वाली डिस्पेंसरी का नज़ारा किसी मेले से कम नहीं था। डिस्पेंसरी के गेट पर लंबी लाइनें, महिलाएं बच्चों को गोद में लिए खड़ी, बुज़ुर्ग लाठी के सहारे धीरे-धीरे अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए और किशोर लड़के-लड़कियाँ उत्सुक निगाहों से स्टॉलों को निहारते हुए दिखाई दे रहे थे। कैंप सुबह 9 बजे शुरू होना था, लेकिन लोग आठ बजे से ही आने लगे। अंदर पहुंचते ही एक कोने में पर्चियां बन रही थीं और दूसरे कोने में टोकन दिए जा रहे थे। जल्दी ही यह ऐलान हुआ कि “आज केवल टोकन लेने वालों का ही इलाज हो सकेगा। कुल 221 मरीजों को टोकन मिला। 50 वर्षीय रहीम अली, जो आंखों की कमजोरी से परेशान थे, को टोकन नहीं मिल सका। उन्होंने मायूस होकर कहा, “डॉक्टर तो आ गए, लेकिन हमें जांच न मिल पाई। अगर और डॉक्टर होते तो हम जैसे गरीबों की भी सुनवाई हो जाती।”
विशेषज्ञ डॉक्टरों की मौजूदगी।

शिविर की सबसे बड़ी ताक़त यह थी कि यहां कई विभागों के विशेषज्ञ डॉक्टर एक साथ मौजूद थे।
- लायंस क्लब की ओर से आए आंखों के विशेषज्ञ
- गाइनेकोलॉजिस्ट, जिन्होंने गर्भवती महिलाओं की जांच की
- मनोचिकित्सक, जो मानसिक स्वास्थ्य परामर्श देने आए
- त्वचा रोग विशेषज्ञ (स्किन डॉक्टर)
- पीडियाट्रिशियन (शिशु रोग विशेषज्ञ)
इसके अलावा एक्स-रे, ब्लड टेस्ट, हीमोग्लोबिन जांच, टीबी स्क्रीनिंग और टीकाकरण जैसी सुविधाएं भी दी गईं। स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. ने कहा, “हमने 30 से अधिक गर्भवती महिलाओं की जांच की। उनमें से अधिकांश में खून की कमी पाई गई। हाई ब्लड प्रेशर और शुगर जैसी समस्याएं भी दिखीं। अगर समय पर जांच न हो तो ऐसी स्थितियां जानलेवा हो सकती हैं।”
बच्चों और किशोरों पर फोकस।
शिविर में टीकाकरण के लिए खास इंतज़ाम था। 0 से 5 साल के बच्चों को पोलियो, डिप्थीरिया और खसरा जैसे टीके लगाए गए। तीन साल के बेटे को टीका लगवाने आईं शकीला ने बताया, “ बड़ा सरकारी अस्पताल दूर है। यहाँ आकर बच्चे का टीका भी लग गया और डॉक्टर साहब ने कैल्शियम सिरप भी लिख दिया। यह हमारे लिए बहुत मददगार है।”
साथ ही किशोर लड़कियों और लड़कों का हीमोग्लोबिन टेस्ट भी किया गया। परिणाम चौंकाने वाले थे। ज्यादातर किशोरियों में खून की कमी पाई गई। पीडियाट्रिशियन डॉ. ने कहा कि “यहां की किशोर लड़कियों में औसतन 8 से 9 ग्राम हीमोग्लोबिन पाया गया, जबकि सामान्य स्तर 12 से ऊपर होना चाहिए। यह आने वाली माताओं और बच्चों दोनों के लिए खतरे की घंटी है।”
कैंसर की जांच और झिझक।

शिविर में मुंह और ब्रेस्ट कैंसर की जांच भी की गई। कई महिलाएं पहले झिझक रही थीं, लेकिन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने समझाया। गुलनाज़ बेगम ने बताया, “मेरे सीने में गांठ थी, पर मैंने कभी जांच नहीं कराई। यहाँ डॉक्टर ने कहा कि यह गंभीर हो सकता है। अब मैं आगे जांच ज़रूर कराऊंगी।” विशेषज्ञों के अनुसार, कैंसर के शुरुआती लक्षण अगर समय पर पकड़ लिए जाएं तो इलाज आसान और सस्ता हो सकता है।
भीड़ और सीमाएँ।
मरीजों की संख्या बहुत अधिक थी। टोकन न मिलने से कई लोग निराश लौट गए। मोहम्मद आसिफ़, जो अपनी मां को लेकर आए थे, ने कहा कि “भीड़ इतनी थी कि लगा मेला लग गया है। डॉक्टर कम थे, मरीज ज़्यादा। फिर भी जिनको इलाज मिला, उन्हें राहत मिली।” यह दृश्य भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत को भी उजागर करता है। जहां सुविधाएं सीमित हैं और मांग बहुत बड़ी।
भारत में स्वास्थ्य की चुनौतियाँ।
भारत में मातृ मृत्यु दर (MMR) अब भी 100 प्रति लाख जीवित जन्म के आसपास है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा और भी अधिक है। गर्भवती महिलाओं में खून की कमी (एनीमिया) और हाई ब्लड प्रेशर प्रमुख कारण हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के मुताबिक, 15-49 वर्ष की आधी से ज्यादा महिलाएं एनीमिक हैं। शिविर में किशोरियों के कम हीमोग्लोबिन स्तर इसका स्थानीय प्रमाण था। शिशु मृत्यु दर (IMR) में सुधार हुआ है, लेकिन अब भी कई राज्यों में यह 30 प्रति 1000 जीवित जन्म से अधिक है। नियमित टीकाकरण और पोषण की कमी यहां की प्रमुख चुनौतियां हैं।
कैंसर और अन्य बीमारियाँ।
भारत में हर साल करीब 14 लाख नए कैंसर मरीज सामने आते हैं। मुंह और ब्रेस्ट कैंसर सबसे सामान्य प्रकारों में हैं, खासकर ग्रामीण और अर्धशहरी इलाकों में जहां जागरूकता और स्क्रीनिंग कम है।
मानसिक स्वास्थ्य।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, भारत में हर सात में से एक व्यक्ति मानसिक स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहा है। लेकिन प्रत्येक 1 लाख आबादी पर केवल 0.3 मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं। शिविर में मनोचिकित्सक की उपस्थिति इस कमी को रेखांकित करती है।
ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचा।

भारत में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) ग्रामीण स्वास्थ्य की रीढ़ हैं। लेकिन 2022 की सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, पीएचसी में 25% डॉक्टरों की कमी और सीएचसी में 80% विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है। यही वजह है कि ग्रामीण और अर्धशहरी इलाकों में लोग स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रह जाते हैं और अस्थायी शिविर ही एकमात्र उम्मीद बन जाते हैं।
समुदाय की प्रतिक्रिया और उम्मीदें।
स्थानीय लोगों ने शिविर को सराहा और इसे नियमित रूप से आयोजित करने की मांग की।
65 वर्षीय सलीमा बी ने कहा कि “आज डॉक्टर आए, दवा मिली, अच्छा लगा। लेकिन यह सिर्फ एक दिन की बात न हो। हमें चाहिए कि महीने में एक बार भी ऐसा कैंप लगे।”
एक शिक्षक ने टिप्पणी की, “स्वास्थ्य सेवा का स्थायी समाधान चाहिए। शिविर से मदद मिलती है, लेकिन हमें स्थायी अस्पताल और डॉक्टरों की मौजूदगी चाहिए।”
एक दिन की राहत।
22 सितंबर का यह स्वास्थ्य शिविर लोगों के लिए उम्मीद की किरण लेकर आया। एक ही दिन में 221 मरीजों को परामर्श मिला, कई बच्चों का टीकाकरण हुआ और महिलाओं की गंभीर बीमारियों की पहचान हो सकी। लेकिन भीड़ और सीमित संसाधनों ने यह दिखा दिया कि असली चुनौती कहीं बड़ी है।
भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार केवल शिविरों से नहीं होगा। इसके लिए ज़रूरी है।
- ग्रामीण क्षेत्रों में स्थायी स्वास्थ्य ढांचे को मज़बूत करना,
- विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करना,
- महिलाओं और किशोरियों में एनीमिया और पोषण की समस्या को प्राथमिकता देना,
- और मानसिक स्वास्थ्य को भी स्वास्थ्य एजेंडा में शामिल करना।
जैसा कि एक स्थानीय स्वयंसेवक ने कहा कि “आज का दिन लोगों के लिए राहत का दिन था। लेकिन असली बदलाव तब होगा जब यह राहत हर दिन मिले।”