‘जश्न-ए-चरागा’ में अमन और इंसानियत की रौशनी से जगमगाया दरगाह परिसर

प्रेस विज्ञप्ति
तिथि: 18 अक्टूबर 2025
स्थान: दरगाह हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया, नई दिल्ली

हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के ऐतिहासिक आयोजन ने दिया साझा संस्कृति और एकता का संदेश। भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब, सांझी विरासत और सामाजिक समरसता का प्रतीक बना एक अद्भुत आयोजन — ‘जश्न-ए-चरागा’ — आज शाम ऐतिहासिक दरगाह हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया में रूहानी और भव्य वातावरण में संपन्न हुआ। इस आयोजन ने यह सशक्त संदेश दिया कि भारत की असली ताक़त उसकी विविधता में निहित एकता और उसकी सांस्कृतिक मेलजोल की परंपरा में बसती है।

कार्यक्रम का आयोजन मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (MRM) द्वारा किया गया, जो वर्षों से देशभर में अमन, भाईचारे और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए कार्यरत है। इस अवसर पर विभिन्न धर्मों, समुदायों और विचारधाराओं से आए सैकड़ों लोगों ने मिलकर देश में शांति, प्रेम और सौहार्द की दुआ की।

दरगाह परिसर को इत्र, फूलों और चादरों से सजाया गया। कार्यक्रम की शुरुआत परिसर की साफ-सफाई, इत्र और गुलाबजल के छिड़काव तथा सूफ़ियाना संगीत के मधुर सुरों से हुई।

यह आयोजन इस बात का प्रतीक बना कि भारत की रूहानी और सांस्कृतिक परंपराएं आज भी समाज को जोड़ने का कार्य कर रही हैं।

डॉ. इंद्रेश कुमार ने दिया इंसानियत का संदेश।

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के मार्गदर्शक डॉ. इंद्रेश कुमार मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने अपने प्रेरक संदेश में कहा कि “हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने हमेशा इंसान को देखा, धर्म को नहीं। उनकी दरगाह पर जलने वाला हर दीया इंसानियत की लौ है। हम यहां किसी राजनीतिक उद्देश्य से नहीं, बल्कि मोहब्बत फैलाने के लिए आए हैं।”

उन्होंने आगे कहा “यह आयोजन राजनीति से प्रेरित नहीं, बल्कि रूहानी एकता और मानवता को उजागर करने वाला प्रयास है। जब हम दीये जलाते हैं, तो हम नफ़रत के अंधेरे को मिटाने का प्रण करते हैं।”

डॉ. कुमार ने कहा “भारत को जोड़ने के लिए मंदिर और मस्जिद दोनों की रौशनी ज़रूरी है। ये दीये हमें याद दिलाते हैं कि भारत एक विचार है — प्रेम और करुणा का विचार।”

यह साझी विरासत का जश्न है।

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक प्रो. शाहिद अख्तर ने कहा कि “‘जश्न-ए-चरागा’ न कोई नया प्रयोग है, न किसी विशेष धर्म का प्रचार। यह हमारी उस साझा विरासत का उत्सव है, जो सदियों से इस देश की पहचान रही है।” उन्होंने आगे कहा “जब हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई एक साथ दीये जलाते हैं, तो वह दीपावली हो या ईद — वह इंसानियत का त्योहार बन जाता है। आज हमने मोहब्बत की रौशनी फैलाई है, जो किसी मज़हब की नहीं, सबकी है।”

सूफ़ियाना कलाम और शांति की दुआ।

कार्यक्रम के दौरान स्थानीय कलाकारों और सूफ़ी गायकों ने सूफ़ियाना कलाम प्रस्तुत किए। अमन और भक्ति के गीतों ने माहौल को और अधिक रूहानी बना दिया। इस अवसर पर देश की शांति, एकता और अखंडता के लिए मौन प्रार्थना भी की गई।

एक परंपरा, जो जोड़ती है।

‘जश्न-ए-चरागा’ केवल एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि वह विचार है जो भारत के असली चरित्र को प्रतिबिंबित करता है —
जहां धार्मिक स्थलों की पवित्रता के साथ-साथ सामाजिक समरसता भी पनपती है।

यह आयोजन हर भारतीय को यह याद दिलाता है कि जब हम दीया जलाते हैं, तो हम अपने भीतर के अंधकार को भी दूर करते हैं।
इस आयोजन ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक भावना, एक संवेदना और एक संस्कृति है।

और जब-जब इंसानियत पर संकट आता है — भारत के मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च मिलकर उम्मीद की लौ जलाते हैं।