सोसाइटी निवासियों की सुरक्षा से खिलवाड़

सपनों का आशियाना या लापरवाही का गढ़?
घर खरीदने का सपना, अपना एक सुरक्षित घोंसला और परिवार के साथ सुकून भरा जीवन—यह हर व्यक्ति की चाहत होती है। खासकर वह मध्यमवर्गीय भारतीय, जो रोजगार और बेहतर भविष्य की तलाश में शहरों की ओर पलायन करता है, अपनी जीवन भर की कमाई लगाकर किसी तरह एक आशियाने का इंतज़ाम करता है।
बिल्डरों के लुभावने वादे, सुनहरे भविष्य के सपने और “गेटेड सोसाइटी” के नाम पर सुरक्षित जीवन का भरोसा—इन सबके बीच लोग दिल्ली-एनसीआर के विभिन्न इलाकों में फ्लैट खरीद लेते हैं।
ऐसी बहुमंज़िला इमारतों में बिना बाधा लिफ्ट सेवा, साफ-सफाई, बिजली, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, पर्यावरण सुरक्षा और सबसे महत्वपूर्ण फायर सेफ्टी सिस्टम के सुचारु संचालन का वादा किया जाता है। लेकिन ज़मीनी हकीकत कई बार इन दावों की पोल खोल देती है।
गाजियाबाद के दिव्यांश ओनिक्स की घटना
गाजियाबाद के एनएच-24 पर मणिपाल अस्पताल के सामने, जयपुरिया सनराइज़ ग्रीन्स टाउनशिप में स्थित दिव्यांश ओनिक्स सोसाइटी (टावर D1 से D4) में दो दिन पहले एक गंभीर घटना सामने आई।
टावर D4 के एक फ्लैट में खाना बनाते समय अचानक तेल में आग लग गई। आग को बढ़ता देख परिजनों ने तुरंत मेंटेनेंस टीम और सिक्योरिटी गार्ड को सूचना दी। मौके पर पहुंचे सुरक्षा गार्ड ने किसी तरह आग पर काबू पाया, जिससे बड़ा जान-माल का नुकसान टल गया।
हालांकि, इस घटना ने सोसाइटी में मौजूद फायर सेफ्टी सिस्टम की सच्चाई उजागर कर दी।
स्मोक डिटेक्टर सिर्फ नाम के?
बिल्डर द्वारा यह दावा किया गया है कि हर फ्लैट, किचन और कॉमन एरिया में स्मोक डिटेक्टर लगाए गए हैं, जो 24 घंटे सक्रिय रहकर धुएं की स्थिति में अलार्म बजाकर सभी निवासियों, सुरक्षा और मेंटेनेंस टीम को सतर्क करते हैं।
लेकिन हकीकत यह है कि ये उपकरण केवल टेस्टिंग के समय ही चालू किए जाते हैं, बाकी समय बंद रहते हैं। इसी कारण D4 में लगी आग की जानकारी न तो अन्य निवासियों को मिली और न ही किसी स्वचालित सुरक्षा व्यवस्था ने काम किया। सौभाग्य से व्हाट्सऐप ग्रुप के ज़रिए बाद में लोगों को इस घटना की जानकारी मिल पाई।
निवासियों का सर्वे और चौंकाने वाले तथ्य
घटना के बाद सोसाइटी निवासियों ने व्हाट्सऐप पर एक सर्वे चलाया, जिसमें एक दिन के भीतर 69 लोगों ने भाग लिया।
- 62 निवासियों ने बताया कि उनके घर में किसी भी कमरे या किचन में स्मोक डिटेक्टर काम नहीं कर रहा है।
- केवल 7 लोगों ने कहा कि कुछ कमरों में यह उपकरण चालू हालत में है।
इसके बाद सुरक्षा और मेंटेनेंस से जुड़े व्हाट्सऐप ग्रुप में 50 से अधिक संदेश भेजे गए, जिसमें बिल्डर से जुड़े लोग भी शामिल हैं, लेकिन आज तक यह जवाब नहीं मिला कि फायर सेफ्टी सिस्टम क्यों निष्क्रिय है और आखिरी बार फायर सेफ्टी ड्रिल कब कराई गई थी।
मेंटेनेंस के नाम पर लाखों की वसूली, जवाबदेही शून्य
इस सोसाइटी में कुल 605 फ्लैट हैं। प्रत्येक फ्लैट से औसतन ₹6000 प्रति माह मेंटेनेंस शुल्क लिया जाता है।
यानी हर महीने लगभग ₹36 लाख की वसूली।
इसके बावजूद:
- कभी खर्च का हिसाब निवासियों को नहीं दिया गया
- सुरक्षा इंतज़ाम नाकाफी हैं
- निवासियों की जान जोखिम में डाली जा रही है
निवासियों की मांगें, बिल्डर की चुप्पी

कुछ निवासियों ने बिल्डर को लिखित ई-मेल भेजकर निम्न मांगें रखी हैं:
- पूरी सोसाइटी में सभी स्मोक डिटेक्टरों की तत्काल जांच और कार्यात्मक परीक्षण
- यह सुनिश्चित करना कि सभी फायर सेफ्टी उपकरण हर समय चालू रहें, केवल टेस्टिंग के समय नहीं
- सुधारात्मक कार्रवाई के बाद निवासियों के साथ लिखित पुष्टि रिपोर्ट साझा करना
- फायर सेफ्टी सिस्टम के लिए नियमित प्रिवेंटिव मेंटेनेंस और ऑडिट व्यवस्था
लेकिन इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक, ई-मेल भेजे 15 घंटे से अधिक समय बीत चुका है और बिल्डर की ओर से कोई जवाब नहीं आया है।
यह चुप्पी इस बात का संकेत देती है कि कहीं न कहीं किसी बड़ी अनहोनी का इंतज़ार किया जा रहा है।
प्रशासन की चुप्पी और बड़ा सवाल
यह वही सोसाइटी है जहां:
- लिफ्ट बार-बार खराब होती है
- सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से बदबूदार पानी आता है
- कभी भी बिजली काट दी जाती है और लोग घंटों अंधेरे में रहने को मजबूर होते हैं
इस पूरे मामले में रेरा यूपी और मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई जा चुकी है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
सवाल यह है—क्या यही सुशासन है?
क्या आम नागरिक अपनी मेहनत की कमाई से सिर्फ मेंटेनेंस देता रहे और बदले में न सुरक्षा मिले, न बुनियादी सुविधाएं?