सपनों की कसौटी पर भारत – जहाँ न्याय, स्वतंत्रता और आलोचना साँस लेती है।

संविधान दिवस पर विशेष
लेखक: अनीस आर खान, नई दिल्ली
आज का दिन सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। 26 नवंबर का यह दिन भारत के इतिहास की सबसे पवित्र और दूरदर्शी घटनाओं में से एक का साक्षी है। 76 साल पहले, 1949 में इसी दिन, भारत की संविधान सभा ने एक ऐसे दस्तावेज़ को स्वीकार किया था, जिसने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नींव रखी। यह सिर्फ़ क़ानूनों का एक संग्रह नहीं, बल्कि एक दर्शन है—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का अटूट संकल्प।
जब डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने संविधान सभा के पटल पर इस मसौदे को रखा, तो यह केवल 395 अनुच्छेदों और 8 अनुसूचियों का एक पुलिंदा नहीं था; यह सदियों की गुलामी, सामाजिक असमानता और विभाजन की पीड़ा झेल चुके एक राष्ट्र के लिए उज्ज्वल भविष्य का पथप्रदर्शक था। इसे तैयार करने में 2 साल, 11 महीने और 18 दिन लगे, और इसके हर शब्द पर भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों और विचारधाराओं की बहस की छाप है।
संविधान दिवस मनाना, दरअसल, उस महान विचार को श्रद्धांजलि देना है कि भारत का हर नागरिक, चाहे उसकी जाति, धर्म, लिंग, या आर्थिक स्थिति कुछ भी हो, क़ानून की नज़र में समान है। लेकिन एक लेखक के रूप में, हमारा काम केवल जश्न मनाना नहीं, बल्कि उस “कसौटी” की जाँच करना भी है जिस पर वर्तमान भारत खड़ा है। क्या हम आज भी उन मूल्यों के साथ न्याय कर रहे हैं जिनके लिए यह पवित्र दस्तावेज़ लिखा गया था?
संविधान की आत्मा: प्रस्तावना का वाचन

भारतीय संविधान की प्रस्तावना (Preamble) इसकी आत्मा है। ‘हम, भारत के लोग’ से शुरू होने वाली यह उद्घोषणा बताती है कि शक्ति का अंतिम स्रोत जनता है। यह चार स्तंभों पर टिकी है:
- न्याय (Justice): सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय।
- स्वतंत्रता (Liberty): विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता।
- समानता (Equality): प्रतिष्ठा और अवसर की समानता।
- बंधुत्व (Fraternity): व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता।
संविधान के निर्माता जानते थे कि अगर इन चारों में से एक भी स्तंभ कमज़ोर हुआ, तो लोकतंत्र का महल ढह जाएगा। डॉ. अंबेडकर ने स्पष्ट कहा था कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक वह सामाजिक लोकतंत्र पर आधारित न हो। सामाजिक लोकतंत्र का अर्थ है जीवन के उस मार्ग को अपनाना जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन के सिद्धांतों के रूप में मान्यता देता है।
एक समावेशी भारत की परिकल्पना।
संविधान सभा में मौजूद हर सदस्य एक ऐसे भारत का निर्माण करना चाहता था जो अतीत की गलतियों को न दोहराए।
- धर्मनिरपेक्षता (Secularism): यह सुनिश्चित किया गया कि राज्य का कोई धर्म नहीं होगा और वह सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करेगा। यह पश्चिमी ‘सेक्युलरिज्म’ से अलग है, जहाँ राज्य धर्म से दूर रहता है; भारतीय मॉडल में राज्य सभी धर्मों को संरक्षण देता है।
- मौलिक अधिकार (Fundamental Rights): अनुच्छेद 12 से 35 तक, नागरिकों को ऐसे अधिकार दिए गए जो सरकार की ताक़त को सीमित करते हैं। ये अधिकार अदालतों द्वारा प्रवर्तनीय (enforceable) हैं, यानी अगर सरकार या कोई अन्य व्यक्ति आपके अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो आप सीधे कोर्ट जा सकते हैं।
- संघवाद (Federalism): देश की विविधता को देखते हुए, शक्ति का विभाजन केंद्र और राज्यों के बीच किया गया, ताकि हर क्षेत्र की आकांक्षाओं को सम्मान मिल सके।
यह दूरदर्शिता थी कि उन्होंने न केवल आज के लिए, बल्कि भविष्य की चुनौतियों के लिए भी रास्ते खोले—यही वजह है कि संविधान में संशोधन (Amendment) की प्रक्रिया को भी लचीला रखा गया।

ज़मीनी हकीकत और संवैधानिक मूल्यों की चुनौतियाँ।
आज, जब हम संविधान दिवस मना रहे हैं, तो हमें एक कठोर आत्म-परीक्षण करना होगा। क्या संविधान की भावना, जिसे ‘चेतना’ कहा जा सकता है, आज भी हमारे समाज और राजनीति में जीवित है?
1. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संकट (Erosion of Free Speech)
संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) हमें बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में, ‘असहमति’ (Dissent) को अक्सर ‘देशद्रोह’ (Sedition) या राष्ट्र-विरोधी गतिविधि के रूप में लेबल किया जाने लगा है।
आलोचना: जब एक पत्रकार, कार्यकर्ता, या छात्र सरकार की नीतियों की आलोचना करता है, तो उन्हें तुरंत निशाने पर ले लिया जाता है। संवैधानिक लोकतंत्र की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती यह है कि वह अपने भीतर आलोचना को पचा लेता है। यदि सरकारें आलोचना को दुश्मनी मानने लगें, तो वे संविधान के ‘स्वतंत्रता’ के आदर्श को सीधे तौर पर चोट पहुँचा रही हैं। जब नागरिक डर के माहौल में अपने विचार व्यक्त करने से कतराते हैं, तब संविधान की रीढ़ कमज़ोर पड़ जाती है। आलोचना, दरअसल, लोकतंत्र के लिए एक ऑक्सीजन सिलेंडर है।
2. संस्थागत स्वतंत्रता पर दबाव
लोकतंत्र के तीन स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—के बीच शक्ति संतुलन ही संविधान की सबसे बड़ी गारंटी है।
आलोचना: विभिन्न रिपोर्टों और सार्वजनिक बहसों से यह स्पष्ट है कि कुछ स्वायत्त संस्थाओं, जैसे चुनाव आयोग और यहाँ तक कि केंद्रीय जाँच एजेंसियों पर भी, कार्यकारी हस्तक्षेप का साया बढ़ रहा है। न्यायपालिका, जो संविधान की अंतिम व्याख्याकार है, पर भी मुकदमों के भारी बोझ और नियुक्तियों के मसले को लेकर सवाल उठते रहे हैं। अगर संविधान को बचाने वाली संस्थाएँ कमज़ोर होंगी, तो आम आदमी की संवैधानिक सुरक्षा कहाँ रहेगी?
3. सामाजिक और आर्थिक न्याय का बढ़ता फ़ासला
संविधान की ‘समानता’ और ‘न्याय’ की गारंटी के बावजूद, देश में आर्थिक असमानता (Economic Inequality) खतरनाक स्तर पर पहुँच गई है। एक तरफ़ देश की जीडीपी बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ़ लाखों लोग स्वास्थ्य, शिक्षा और सम्मानजनक रोज़गार जैसी मौलिक ज़रूरतों से वंचित हैं।
आलोचना: आरक्षण, नीतियां और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन अक्सर धीमा और त्रुटिपूर्ण होता है। दलितों, आदिवासियों, और महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा की घटनाएँ हमें याद दिलाती हैं कि ‘बंधुत्व’ (Fraternity) का आदर्श सिर्फ़ किताबों तक सीमित न रह जाए। संविधान ने केवल राजनीतिक समानता दी है—एक वोट, एक मूल्य—लेकिन जब तक हर व्यक्ति को समान अवसर नहीं मिलता, तब तक यह राजनीतिक समानता अधूरी है।

जनता की आवाज़: संविधान कैसा दिखता है आम नागरिक की आँखों में।
फीचर राइटिंग बिना लोगों की आवाज़ के अधूरी है। हमने समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि विचारों को समझने का प्रयास किया कि उनके लिए संविधान दिवस का क्या अर्थ है और वे मौजूदा चुनौतियों को कैसे देखते हैं। इस सम्बन्ध में
प्रोफेसर आर.के. सिंह (72 वर्ष, सेवानिवृत्त शिक्षाविद)
ने बताया कि “संविधान हमारे नैतिक कंपास की तरह है। जब भी राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ता है, यह हमें दिशा दिखाता है। मेरी चिंता यह है कि नई पीढ़ी को अब संवैधानिक इतिहास और बहसें कम पढ़ाई जा रही हैं। अगर आप नागरिक को उसके अधिकारों की शक्ति से वंचित कर देंगे, तो वह मूकदर्शक बन जाएगा। हमें वापस अपने स्कूल करिकुलम में संवैधानिक मूल्यों को मज़बूती से लाना होगा। संविधान रटने की चीज़ नहीं, जीने की कला है।”
सोनिया दास (25 वर्ष, छात्र कार्यकर्ता)
ने बताया कि “मेरे लिए संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। जब मैं देखती हूँ कि विरोध प्रदर्शनों पर रोक लगाई जाती है, या छात्रों को उनकी आवाज़ उठाने पर देशद्रोही कहा जाता है, तो मुझे लगता है कि हम संविधान को सिर्फ़ 26 जनवरी और 15 अगस्त को याद करते हैं। संविधान ने मुझे बोलने की हिम्मत दी है, और मैं अपने देश की कमियों को उजागर करना अपना संवैधानिक कर्तव्य मानती हूँ। हमारा संविधान हमें सवाल पूछने की ताक़त देता है, और यह ताक़त छीननी नहीं चाहिए।”
रहीम भाई (45 वर्ष, लघु उद्यमी, लखनऊ)
ने बताया कि “संविधान मेरे लिए विश्वास है। विश्वास है कि मैं किसी भी धर्म या जाति का हूँ, मेरा बिज़नेस सुरक्षित रहेगा। लेकिन जब बाज़ार में धर्म या राजनीति के नाम पर तनाव फैलता है, तो सबसे पहले छोटे व्यवसायी डरते हैं। मेरी गुज़ारिश है कि ‘कानून का राज’ (Rule of Law) सिर्फ़ कागज़ पर नहीं, बल्कि हर थाने और हर सरकारी दफ़्तर में लागू होना चाहिए। हमें डर नहीं, सुरक्षा चाहिए, जो संविधान की गारंटी है।”
कविता मेहरा (38 वर्ष, घरेलू सहायक और सामाजिक कार्यकर्ता)
ने बताया कि “समानता! यह शब्द सबसे ज़रूरी है। आज भी मेरे समुदाय की महिलाओं को काम पर समान वेतन नहीं मिलता। उनके साथ सम्मान से बात नहीं की जाती। मेरे लिए संविधान तब ज़िंदा होगा, जब मेरे बच्चे बिना किसी डर या शर्म के सबसे बेहतरीन स्कूल में पढ़ सकेंगे और उन्हें कोई उनकी जाति के नाम पर अलग नहीं बिठाएगा। बाबासाहेब ने जो रास्ता दिखाया था, वह अभी पूरा नहीं हुआ है। लड़ाई ज़मीनी स्तर पर रोज़ लड़ी जाती है।”

नागरिक का दायित्व।
संविधान किसी राजा या शासक की बपौती नहीं है; यह हम, भारत के लोगों का आपसी समझौता है। इसकी हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी किसी एक संस्था या सरकार पर नहीं, बल्कि हर नागरिक पर है।
आज के दिन हमारा संकल्प होना चाहिए:
- संविधान का अध्ययन: केवल प्रस्तावना पढ़कर नहीं रुकना है, बल्कि अधिकारों और कर्तव्यों (Fundamental Duties) को गहराई से समझना है।
- संवैधानिक नैतिकता: व्यक्तिगत जीवन में संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) का पालन करना, यानी हर कार्य में न्याय, स्वतंत्रता और समानता को महत्व देना।
- संस्थाओं का सम्मान, अंधभक्ति नहीं: लोकतंत्र की संस्थाओं (जैसे न्यायपालिका, मीडिया) का सम्मान करना, लेकिन उनकी ग़लतियों की आलोचना करने से पीछे न हटना।
संविधान के अंतिम पन्नों पर हस्ताक्षर होने के बाद, डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि भारतीय लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हम राजनीति में ‘भक्ति’ (Devotion) को कहाँ तक हटा पाते हैं। राजनीति में भक्ति तानाशाही की ओर ले जाती है। हमें व्यक्ति से ऊपर संस्था और नियम को रखना होगा।
हमें कैसा भारत बनाना है?
संविधान दिवस, 2025, हमें उस मोड़ पर खड़ा करता है जहाँ से हमें तय करना है कि हम कैसा भारत बनाना चाहते हैं। एक ऐसा भारत जहाँ विरोध को भी सम्मान मिले, जहाँ न्याय हर दरवाज़े तक पहुँचे, और जहाँ हर नागरिक को अपने सपनों को पूरा करने की पूरी आज़ादी हो।
संविधान का पाठ एक सतत प्रक्रिया है, एक जीवंत यात्रा है। यह हमें सिखाता है कि हम परिपूर्ण नहीं हैं, लेकिन परिपूर्णता की दिशा में लगातार आगे बढ़ सकते हैं। जब तक देश का सबसे कमज़ोर व्यक्ति संवैधानिक अधिकारों के तहत सुरक्षित महसूस नहीं करता, तब तक यह दिवस मनाने का हमारा काम अधूरा है।
आइए, हम सब मिलकर इस दस्तावेज़ की हिफ़ाज़त करें—सिर्फ़ क़ानून के रूप में नहीं, बल्कि अपने सामूहिक विवेक और हृदय के रूप में।
जय हिन्द।