जयपुरिया सोसाइटी में आठ घंटे की ब्लैकआउट ने खोला बिल्डर की करतूतों का पिटारा

(तीन हज़ार फ्लैट्स की सोसाइटी में निवासियों ने पहले ही चुकाया था बिजली का बिल, फिर भी काट दी गई बिजली !)
लहर डेस्क
गाज़ियाबाद का एनएच-24, दिल्ली से सटा वह इलाका जहाँ ऊँची-ऊँची इमारतें आधुनिक जीवनशैली के सपनों को समेटे खड़ी हैं। इन्हीं में से एक है — जयपुरिया सनराइज ग्रीन्स सोसाइटी, जो मणिपाल हॉस्पिटल के सामने बमहेटा गाँव के समीप बसे उस नए शहर की निशानी है, जहाँ परिवारों ने अपनी उम्र भर की जमा-पूँजी लगाकर एक सुरक्षित और सुखद घर का सपना देखा था। परंतु आज यह सपना, सुविधाओं के अभाव और लापरवाही के अंधेरे में डूब गया ।
सुविधाओं के नाम पर छलावा
करीब 3000 से अधिक फ्लैट्स वाली इस विशाल सोसाइटी में जहां दिव्यानश आनिक्स , गोल्डन गेट ,एरोकोन , ऑर्गैनिक होमेस नामक सोसायटी बसई है 75 प्रतिशत से अधिक निवासियों को घर सौंपे जा चुके हैं। पर “घर” देने और “घर जैसी सुविधा” देने में बड़ा अंतर होता है।
बिल्डर हर महीने मेंटेनेंस और पावर बैकअप के नाम पर चार से छह हज़ार रुपये तक की मोटी रकम वसूलता है, लेकिन परिणाम? लिफ्ट अक्सर बंद, स्वच्छ पानी की व्यवस्था नाममात्र की, और बिजली जाने पर बैकअप का नाम तक नहीं। हाल ही में जल गुणवत्ता की जांच में पाया गया कि पीने का पानी मानकों पर खरा नहीं उतरता। पावर बैकअप के नाम पर हर फ्लैट से भारी शुल्क वसूला गया, लेकिन इतने फ्लैट्स के लिए पर्याप्त डीजी सेट्स ही नहीं लगाए गए।

जब बिजली गई — और उम्मीद भी साथ चली गई
29 अक्टूबर की सुबह जब निवासी अपने बच्चों को स्कूल भेजने, ऑनलाइन मीटिंग्स की तैयारी करने या घर के कामों में जुटे थे — तभी अचानक पूरा परिसर अंधेरे में डूब गया।
सुबह 7 बजे से दोपहर 3 बजे तक बिजली गुल रही।
कारण सुनकर कोई भी दंग रह जाए — पावर सब-स्टेशन से बिजली इसलिए काट दी गई क्योंकि बिल्डर ने उसका निर्माण खर्च — करीब 90 लाख से एक करोड़ रुपये — अभी तक नहीं चुकाया था।
यानी, वायागतिगत बिल्डर और सब-स्टेशन संचालक ( जयपूरिया ) के बीच हुए विवाद की कीमत चुकाई समाज के आम लोगों ने, जिन्होंने अपने हिस्से की बिजली पहले ही UPPCL को 18 से 20 हजार रुपये देकर प्रीपेड कनेक्शन के रूप में ले रखी थी।
जब भुगतान करने वाला भी अपराधी बना दिया गया
सोचिए, आप किसी टेलीकॉम कंपनी का प्रीपेड सिम कार्ड इस्तेमाल करते हैं, समय पर रिचार्ज करते हैं, और फिर अचानक कंपनी बिना कारण आपका सिम बंद कर दे — बिना सूचना, बिना गलती आपकी।
क्या आप इसे न्याय कहेंगे?
ठीक वैसा ही हुआ जयपुरिया सनराइज ग्रीन्स के निवासियों के साथ। उन्होंने अपनी बिजली का भुगतान पहले ही कर दिया, फिर भी उन्हें दिनभर बिजली से वंचित रहना पड़ा। यह केवल तकनीकी गलती नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है।

बिजली, पानी, इंटरनेट — अब विलासिता नहीं, ज़रूरत हैं
आज के युग में बिजली और इंटरनेट केवल सुविधा नहीं, बल्कि जीवन की अनिवार्य शर्तें बन चुके हैं।
इनसे किसी को वंचित करना, खासकर तब जब उसने पूरा भुगतान कर रखा हो, क़ानूनन अपराध और नैतिक दृष्टि से शर्मनाक है। निवासियों ने कई बार प्रशासन और बिजली विभाग से शिकायत की, परंतु अब तक किसी ने ठोस कदम नहीं उठाया।
प्रशासन और न्याय प्रणाली से सवाल
क्या कोई भी बिल्डर इतनी आसानी से हजारों लोगों की ज़िंदगी अंधेरे में धकेल सकता है?
क्या कोई ऐसा तंत्र नहीं जो ऐसे मामलों में तत्काल हस्तक्षेप करे? क्या “डिजिटल इंडिया” और “स्मार्ट सिटी” के नारे तभी तक लागू हैं जब तक लाइट जल रही हो?

इन सवालों के जवाब देना अब प्रशासन की ज़िम्मेदारी है और जिसने भी नागरिकों को उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित किया उसे दंडित नहीं किया जाना चाहिए?? सरकार और स्थानीय निकायों को ऐसे मामलों में नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कठोर और तेज़ कार्रवाई करनी होगी।
आशियाना नहीं, जिम्मेदारी का प्रतीक बने घर
जयपुरिया सनराइज ग्रीन्स की यह घटना केवल एक सोसाइटी की कहानी नहीं — यह उन हजारों परिवारों की आवाज़ है, जो अपने सपनों के घर में शांति, सुरक्षा और सुविधा की उम्मीद लेकर आते हैं, पर बिल्डर की लापरवाही और व्यवस्था की चुप्पी के बीच दम घुटता पाते हैं। हर ईंट सिर्फ दीवार नहीं, एक परिवार का सपना है — और उन सपनों के साथ ऐसा खिलवाड़, किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक है।