बिहार की रेल त्रासदी, 12,000 ट्रेनों का वादा और ज़मीनी हक़ीकत

अनीस आर खान

संकटकाल या महापर्वों के दौरान देश के किसी भी कोने से बिहार की ओर जाने वाली रेल पटरियाँ केवल धातु के ट्रैक नहीं रह जातीं; वे आशा, विवशता और अंतहीन संघर्ष की कहानियाँ ढोने लगती हैं। इन कहानियों का केंद्र अक्सर वह प्रवासी श्रमिक वर्ग होता है, जो पेट पालने की मजबूरी में महानगरों की ओर रुख करता है और फिर घर की पुकार पर जान जोखिम में डालकर लौटता है। ऐसे ही एक दौर में, जब लाखों लोगों की वापसी की ज़रूरत आन पड़ी थी—चाहे वह कोविड-19 लॉकडाउन की विभीषिका हो या छठ/दीवाली जैसे महापर्वों का चरम—तब बिहार के लिए 12,000 विशेष ट्रेनें चलाने का वादा किया गया था। यह घोषणा राहत का मरहम लगने वाली थी, लेकिन ज़मीन पर यह वादा एक कड़वे मज़ाक से अधिक कुछ साबित नहीं हुआ। यह आलेख इसी सरकारी आश्वासन और कठोर ज़मीनी वास्तविकता के बीच के भयावह अंतराल का आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह केवल आँकड़ों का खेल नहीं, बल्कि एक मानवीय त्रासदी का दस्तावेज़ है, जिसमें अधिकारियों की बेबसी, यात्रियों का शोषण और घर पहुँचने की अंतिम चाह में हुई मौतें शामिल हैं।

भव्य घोषणा का भ्रमजाल।

किसी भी बड़े सार्वजनिक संकट के समय, सरकार की ओर से आने वाले आश्वासन मरते को तिनके का सहारा देते हैं। 12,000 ट्रेनों के वादे को भी इसी संदर्भ में देखा गया। कल्पना कीजिए, देश के विभिन्न हिस्सों से रोज़ाना औसतन 50 से 100 विशेष ट्रेनों के बदले, 12,000 ट्रेनों का अर्थ था प्रतिदिन सैकड़ों अतिरिक्त सेवाएँ, जो हर प्रवासी को सम्मानजनक तरीके से उसके गंतव्य तक पहुँचा सकती थीं।

12,000 का गणित कहाँ से आया?

तथ्यों की कसौटी पर यह वादा तुरंत लड़खड़ा गया। भारतीय रेलवे की कुल क्षमता, ट्रैक की व्यस्तता, और रोलिंग स्टॉक (कोचों और इंजनों) की उपलब्धता के परिप्रेक्ष्य में 12,000 ट्रेनों का आँकड़ा केवल एक चुनावी या राजनीतिक जुमला प्रतीत होता है।

  • भारतीय रेलवे की क्षमता: भारतीय रेलवे, विश्व के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में से एक है, लेकिन इसकी मुख्य लाइनें पहले से ही संतृप्ति (saturation) के स्तर पर चलती हैं। विशेष रूप से दिल्ली-हावड़ा या मुम्बई-हावड़ा जैसे व्यस्ततम रूट पर, एक भी अतिरिक्त ट्रेन को जगह देना जटिल होता है। 12,000 ट्रेनों का अर्थ है कि लगभग 240 दिनों तक (यदि हर दिन 50 अतिरिक्त ट्रेनें भी चलतीं), रेलवे को अपनी पूरी व्यवस्था को केवल एक राज्य—बिहार—के लिए समर्पित करना पड़ता, जो कि ऑपरेशनल रूप से असंभव था।
  • रोलिंग स्टॉक की कमी: एक सामान्य लंबी दूरी की ट्रेन के लिए लगभग 20 से 24 कोचों (एक रेक) की आवश्यकता होती है। 12,000 ट्रेनों को चलाने के लिए रेलवे को अपनी मौजूदा क्षमता से कई गुना अधिक रेकों को केवल बिहार रूट पर इस्तेमाल करना पड़ता, जिससे देश के बाकी हिस्सों की ट्रेन सेवाएँ पूरी तरह ठप्प हो जातीं। यह स्पष्ट करता है कि यह वादा जमीनी तैयारी के बजाय, तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए किया गया था।

ज़मीनी हक़ीकत और उम्मीदों का दम तोड़ना।

वादे की हवा हवाई थी, लेकिन ज़मीन पर यात्रियों का संघर्ष ठोस और भयावह था। एयरपोर्ट की तरह दिखने वाले बड़े-बड़े स्टेशन, जहाँ एक यात्री के लिए एक सीट और सामान रखने की जगह निश्चित होती है, अचानक युद्ध के मैदान में बदल गए थे।

  • स्टेशनों पर नरसंहार: नई दिल्ली, मुम्बई सेंट्रल, पुणे, बेंगलुरु जैसे प्रमुख स्टेशनों के प्लेटफॉर्म पर तिल धरने की जगह नहीं थी। टिकटें महीनों पहले ही बिक चुकी थीं या तत्काल बुकिंग की खिड़कियाँ खुलते ही कुछ मिनटों में बंद हो जाती थीं। प्लेटफॉर्म्स पर हफ़्तों डेरा डाले लाखों लोग, खाने-पीने और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित थे।
  • ओवरक्राउडिंग की पराकाष्ठा: जो ट्रेनें वास्तव में चलीं, उनकी हालत अमानवीय थी। स्लीपर और जनरल कोचों के बीच का अंतर मिट गया था। शौचालय, गैलरी, कोचों के बीच की जगह और यहाँ तक कि ट्रेन की छतों पर (जो कि अत्यंत खतरनाक और गैरकानूनी है) भी लोग ठूँसे हुए थे।
    • एक यात्री की बाइट –"अधिकारी कुछ नहीं देखते, साहब! हमने 4,000 रुपये देकर दलाल से टिकट लिया। जब ट्रेन आई, तो भेड़-बकरी की तरह घुसना पड़ा। मेरी पत्नी गैलरी में बेहोश हो गई थी। हम ट्रेन में सवार नहीं हुए, बल्कि 'घुसपैठ' की। मुझे 12,000 ट्रेनों का वादा याद है। वो वादा नहीं था, वो हमारे दर्द पर नमक था।"
  • ब्लैक मार्केटिंग और लूट: जब सरकारी तंत्र विफल होता है, तो अवैध बाज़ार पनपता है। सामान्य 700 रुपये की स्लीपर टिकट 3,000 से 5,000 रुपये में बिक रही थी। दलालों और अवैध विक्रेताओं ने यात्रियों की मजबूरी का पूरा फ़ायदा उठाया। पुलिस और रेलवे सुरक्षा बल (RPF) की मौजूदगी के बावजूद, यह लूट आँखों के सामने जारी थी।

अधिकारियों की बेबसी और बचाव।

इस आलोचनात्मक आलेख में यह देखना आवश्यक है कि इस विफलता पर सरकारी तंत्र का क्या रुख रहा। आमतौर पर, अधिकारीगण अपनी व्यवस्थागत सीमाओं और अप्रत्याशित माँग को अपनी विफलता का कारण बताते हैं।

  • रेलवे अधिकारी की बाइट "हमने अपनी अधिकतम क्षमता का उपयोग किया। 12,000 ट्रेनों का आँकड़ा एक व्यापक लक्ष्य था, न कि तत्काल वादा। हम प्रतिदिन 200 से अधिक स्पेशल ट्रेनें चला रहे थे, जो कि सामान्य दिनों से कहीं ज़्यादा है। लेकिन अचानक, एक ही समय में, 50 लाख से अधिक लोगों की माँग को पूरा करने के लिए हमारे पास उतने रेक और उतनी खुली ट्रैक लाइनें नहीं थीं। हर ट्रेन के रोटेशन के लिए समय, सफाई और मेंटेनेंस (रखरखाव) चाहिए होता है। आप एक ट्रेन को तुरंत मोड़कर दूसरी यात्रा के लिए नहीं भेज सकते। यह दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन हमारी व्यवस्था की एक सीमा है।"
  • सरकार के प्रवक्ता की बाइट "विपक्ष राजनीति कर रहा है। सरकार ने संकट को गंभीरता से लिया और रिकॉर्ड संख्या में श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाईं। अगर कुछ अराजक तत्वों ने अधिक दाम पर टिकट बेचे, तो यह रेलवे और पुलिस का विषय है। हमने रेलवे को बार-बार पत्र लिखकर और अधिक ट्रेनें देने का अनुरोध किया। 12,000 ट्रेनों का वादा लोगों को यह बताने के लिए था कि हम उनकी वापसी को कितनी प्राथमिकता दे रहे हैं। विफलता कहाँ हुई? विफलता अप्रत्याशित और एक साथ आई उस भारी भीड़ में हुई, जिसका अनुमान लगाना मुश्किल था।"

यह बचाव केवल शब्दों का मायाजाल था, जो इस तथ्य को छिपा नहीं सका कि एक विशाल सार्वजनिक वादे को ज़मीनी स्तर पर पूरा करने की कोई तैयारी नहीं थी।

घर पहुँचने की चाह और मानवीय कीमत

सबसे मार्मिक और दुखद अध्याय उन लोगों का है, जिनकी घर पहुँचने की इच्छा, उनकी अंतिम इच्छा बन गई। जब रेलगाड़ियाँ पर्याप्त नहीं थीं, और टिकट नहीं मिले, तो लोगों ने सड़क मार्ग और खतरनाक तरीक़ों का सहारा लिया।

  • रेल और बस के चक्कर में जान गँवाना:
    • ट्रेन के बफ़र/छत पर यात्रा: हताश यात्रियों ने ट्रेन के दो डिब्बों को जोड़ने वाले बफ़र पर, डिब्बों के बीच की पतली जगह पर, और यहाँ तक कि ट्रेन की छतों पर भी यात्रा की। संतुलन खोने, बिजली के तारों से टकराने, या तेज़ रफ़्तार के झटके से गिर जाने के कारण कई लोगों की जान गई। रेलवे पुलिस ने ऐसे हादसों के दर्जनों मामले दर्ज किए, जिनमें मृतकों की पहचान करना भी मुश्किल था।सड़क दुर्घटनाएँ: ट्रेनों की कमी के कारण बसें, ट्रक, और यहाँ तक कि ऑटो-रिक्शा भी यात्रियों से ठसाठस भर गए। ओवरलोडिंग के कारण राष्ट्रीय राजमार्गों पर दर्जनों भयानक सड़क दुर्घटनाएँ हुईं। एक ट्रक या बस में क्षमता से तीन-चार गुना ज़्यादा यात्री भरे थे, जिससे ज़रा सी चूक पर बड़ा हादसा हो जाता। राज्य सरकारों के आँकड़ों में इन हादसों में हुई मौतों का एक अलग कॉलम बनाना पड़ा, जो इस बात का प्रमाण था कि यह ‘यातायात’ नहीं, बल्कि ‘अस्तित्व के लिए संघर्ष’ था।स्टेशनों पर दम तोड़ना: अत्यधिक गर्मी, भूख, और भीड़ के कारण भगदड़ जैसी स्थिति बनने से भी कुछ मौतें हुईं। लंबी लाइनों में खड़े बुज़ुर्ग और बच्चे भीषण गर्मी में पानी और भोजन की कमी से स्टेशनों पर ही दम तोड़ गए। ये मौतें सीधे तौर पर किसी हादसे में नहीं, बल्कि व्यवस्थागत विफलता और अमानवीय परिस्थितियों के कारण हुईं।
    यात्री की बाइट – "मेरे भाई ने ट्रेन के दरवाज़े पर लटक कर यात्रा की थी क्योंकि उसे कोई जगह नहीं मिली। दो दिन बाद हमें फ़ोन आया कि वो उत्तर प्रदेश में कहीं पुल से गिर गया। अगर 12,000 ट्रेनें होतीं, अगर उसे एक सामान्य टिकट मिल जाता, तो शायद आज वो ज़िंदा होता। सरकार ने ट्रेन का वादा किया, लेकिन दिया हमें मौत का इंतज़ार।"

आलोचनात्मक निष्कर्ष

12,000 ट्रेनों का वादा एक आदर्शवादी घोषणा थी, लेकिन इसका क्रियान्वयन एक प्रशासनिक दुःस्वप्न। यह त्रासदी केवल ट्रेनों की कमी की नहीं है, बल्कि उस गहरी राजनीतिक-प्रशासनिक दूरी की है जो भारत में अक्सर देखी जाती है:

  1. अवास्तविक लक्ष्य: एक जिम्मेदार सरकार या रेलवे प्रशासन को पता होना चाहिए था कि 12,000 ट्रेनें भौतिक रूप से असंभव थीं। यह घोषणा करके, उन्होंने जनता के सामने एक झूठा दिलासा पेश किया, जिसके टूटने पर निराशा और आक्रोश ने जन्म लिया।
  2. मानवीय गरिमा का हनन: लाखों लोगों को मवेशियों की तरह यात्रा करने के लिए मजबूर किया गया। यह संविधान में प्रदत्त जीवन के अधिकार (Right to Life) और सम्मान के साथ जीने के अधिकार का सीधा उल्लंघन था।
  3. समन्वय की कमी: अगर रेलवे, राज्य सरकारों और गृह मंत्रालय के बीच बेहतर समन्वय होता, तो ट्रेनों को कम से कम मांग वाले शहरों से शुरू किया जा सकता था, और टिकटों की कालाबाजारी को सख्ती से रोका जा सकता था।
  4. आपदा प्रबंधन में चूक: यह वादा और उसकी विफलता दर्शाती है कि भारत का आपदा प्रबंधन तंत्र (चाहे वह प्राकृतिक हो या मानव-जनित प्रवास) अभी भी बड़े पैमाने पर भीड़ और विस्थापन को कुशलतापूर्वक संभालने में विफल रहा है।

अत: 12,000 ट्रेनों का वादा बिहार के प्रवासियों के लिए सुविधा नहीं, बल्कि एक छल था। इसने सरकारी तंत्र की अक्षमता को उजागर किया और कई लोगों के लिए जीवन की कीमत पर घर पहुँचने का एक क्रूर रास्ता खोल दिया। यह केवल अधिकारियों को जवाबदेह ठहराने का नहीं, बल्कि भविष्य में ऐसे अवास्तविक वादे करने से बचने और ठोस, पारदर्शी योजनाएँ बनाने का सबक है। प्रशासन को यह समझना होगा कि हर यात्री केवल एक संख्या नहीं, बल्कि एक इंसान है, जिसे सुरक्षित और सम्मानजनक यात्रा का अधिकार है।

जी, ज़रूर। यहाँ “लहर हिंदी ब्लॉग” के लिए कुछ प्रभावी कॉल टू एक्शन (CTA) विकल्प दिए गए हैं, जिन्हें आप लेख के अंत में इस्तेमाल कर सकते हैं:

  1. चर्चा के लिए:“क्या आप भी इस राजनीतिक वादे और ज़मीनी हक़ीकत के अंतराल से सहमत हैं? अपनी राय हमें टिप्पणी (कमेंट) बॉक्स में ज़रूर बताएँ।”
  2. शेयर करने और जागरूकता फैलाने के लिए:“इस आलोचनात्मक ‘लहर’ को आगे बढ़ाएँ। यह लेख उन सभी लोगों तक पहुँचना चाहिए जो बेहतर व्यवस्था की माँग करते हैं। इसे तुरंत शेयर करें!”
  3. अगले लेखों के लिए जुड़ने हेतु:“व्यवस्था की कमियों पर ‘लहर’ की अगली गहरी चोट पढ़ने के लिए अभी हमें फ़ॉलो करें और हमारे न्यूज़लेटर की सदस्यता लें।”
  4. सीधा सवाल (Action-Oriented):“क्या प्रवासी श्रमिकों के साथ न्याय हुआ? ‘हाँ’ या ‘नहीं’ में जवाब दें और अपनी प्रतिक्रिया लिखें।”