सऊदी अरब में 1.3 करोड़ विदेशी कामगारों को मिली ‘आज़ादी’

अनीस आर खान

अक्टूबर 2025 की एक सुबह दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देश सऊदी अरब से एक ऐसी खबर आई, जिसने केवल श्रम बाजार को ही नहीं, बल्कि मानवाधिकारों के इतिहास को भी झकझोर कर रख दिया। यह खबर थी: सऊदी अरब ने 70 साल पुराने ‘कफाला सिस्टम’ को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है।

यह फैसला केवल एक कानूनी बदलाव नहीं है; यह खाड़ी देशों में काम करने वाले लगभग 1.3 करोड़ विदेशी श्रमिकों—जिनमें 25 लाख से अधिक भारतीय शामिल हैं—के लिए ‘आज़ादी’ का बिगुल है। यह वह आज़ादी है, जिसके लिए दशकों से मानवाधिकार संगठन संघर्ष कर रहे थे, और जिसके कारण इस प्रणाली को ‘आधुनिक गुलामी’ का प्रतीक कहा जाता था।

आइए, इस ऐतिहासिक क्रांति के हर पहलू को गहराई से समझते हैं।

1. शोषण का वो जाल जो दशकों तक कसा रहा।

कफाला एक अरबी शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘स्पॉन्सरशिप’ या ‘ज़मानत’। 1950 के दशक में, जब खाड़ी देशों में तेल की खोज के बाद बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए सस्ते विदेशी श्रम की आवश्यकता पड़ी, तब इस प्रणाली को लागू किया गया। इसका मूल उद्देश्य विदेशी श्रमिकों के प्रवाह को नियंत्रित करना था, लेकिन समय के साथ, यह एक शोषणकारी संस्था बन गई।

कफाला के तहत श्रमिक की स्थिति:

कफाला सिस्टम के केंद्र में ‘कफील’ या स्पॉन्सर होता था, जो अनिवार्य रूप से श्रमिक का नियोक्ता (Employer) होता था। इस सिस्टम में एक विदेशी कामगार की कानूनी स्थिति सीधे और पूरी तरह से उसके कफील से जुड़ी होती थी।

  • संपूर्ण नियंत्रण: कफील के पास ही विदेशी कामगार के वीज़ा, निवास परमिट (इकामा), बैंक खाता खोलने और सबसे महत्वपूर्ण, उसकी नौकरी बदलने या देश छोड़ने (एग्जिट वीज़ा) की अनुमति देने का संपूर्ण अधिकार होता था।
  • पासपोर्ट ज़ब्ती: यह एक आम प्रथा थी कि नियोक्ता कर्मचारी का पासपोर्ट ज़ब्त कर लेता था, जिससे श्रमिक एक तरह से बंधुआ मजदूर बन जाता था। वह न तो शोषण के खिलाफ आवाज़ उठा सकता था, न वेतन बढ़ाने की मांग कर सकता था और न ही अपनी मर्ज़ी से नौकरी छोड़कर देश लौट सकता था।
  • मानवाधिकारों का हनन: लाखों श्रमिकों को कम वेतन, अत्यधिक काम के घंटे, अपर्याप्त रहने की स्थिति और शारीरिक/मौखिक दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा, क्योंकि विरोध करने का मतलब था गिरफ्तारी, डिपोर्टेशन या ‘भागने’ के आरोप में जेल। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) और मानवाधिकार वॉच जैसे संगठनों ने दशकों तक इस व्यवस्था की निंदा की।

सऊदी अरब में प्रवासी श्रमिकों की संख्या देश की कुल आबादी का लगभग 40% है, यानी 1.3 करोड़ से अधिक लोग। इनमें से अधिकतर श्रमिक भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, फिलीपींस और नेपाल जैसे एशियाई देशों से हैं। इन करोड़ों लोगों के लिए कफाला सिस्टम एक अदृश्य बेड़ी की तरह था।

2. ‘विज़न 2030’ के तहत ऐतिहासिक सुधार।

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) के नेतृत्व में, देश अपनी तेल पर निर्भरता कम करने और अर्थव्यवस्था को विविधतापूर्ण बनाने के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना, ‘विज़न 2030’ पर काम कर रहा है। इस विज़न का एक प्रमुख उद्देश्य सऊदी अरब को वैश्विक व्यापार और निवेश के लिए एक आकर्षक केंद्र बनाना भी है।

कफाला सिस्टम की मौजूदगी इस लक्ष्य के आड़े आ रही थी। कोई भी वैश्विक कंपनी ऐसे देश में निवेश करने से हिचकिचाती है जहाँ श्रम कानून अमानवीय माने जाते हों। इसलिए, इस सुधार को केवल मानवाधिकारों के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि आर्थिक प्रतिस्पर्धा और देश की वैश्विक छवि को सुधारने के एक रणनीतिक कदम के रूप में भी देखा जाना चाहिए।

नतीजतन, नवंबर 2020 में सुधारों की घोषणा की गई, और 14 मार्च 2021 को बड़े बदलाव लागू हुए, जिन्हें अक्टूबर 2025 तक चरणबद्ध तरीके से मजबूत किया गया। इन सुधारों को श्रम सुधार पहल (Labor Reform Initiative – LRI) नाम दिया गया है।

3. स्वतंत्रता और सुरक्षा की गारंटी।

कफाला सिस्टम को समाप्त करने के बाद, सऊदी सरकार ने श्रम संबंधों को एक संविदात्मक मॉडल (Contractual Model) पर आधारित किया है। अब श्रमिक और नियोक्ता के बीच का संबंध केवल एक कानूनी अनुबंध पर निर्भर करता है, न कि स्पॉन्सरशिप पर।

नए कानून ने विदेशी कामगारों को तीन बुनियादी स्वतंत्रताएँ प्रदान की हैं:

I: नौकरी बदलने की आज़ादी (Employee Mobility)

यह शायद सबसे बड़ा बदलाव है। अब एक विदेशी कर्मचारी अपने नियोक्ता की अनुमति के बिना नौकरी बदल सकता है।

पुरानी व्यवस्था (कफाला)नई व्यवस्था (संविदात्मक संबंध)
नौकरी बदलने के लिए कफील की लिखित सहमति अनिवार्य थी।कर्मचारी विशिष्ट शर्तों के तहत नौकरी बदल सकता है।

नौकरी बदलने की शर्तें:

  1. अनुबंध की समाप्ति के बाद: यदि श्रमिक का निश्चित अवधि का अनुबंध (Fixed-Term Contract) समाप्त हो जाता है, तो वह बिना किसी सहमति के सीधे किसी अन्य नियोक्ता के पास जा सकता है।
  2. अनुबंध की अवधि के दौरान: यदि अनुबंध अभी भी वैध है, तो श्रमिक को एक निश्चित नोटिस पीरियड (आमतौर पर 90 दिन) पूरा करना होगा और कुछ विनियामक शर्तों का पालन करना होगा।
  3. नियोक्ता का उल्लंघन: यदि वर्तमान नियोक्ता अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन करता है—जैसे कि लगातार तीन महीने तक वेतन का भुगतान न करना, या वीज़ा/इकामा का नवीनीकरण न करना—तो श्रमिक बिना किसी नोटिस या सहमति के तुरंत नौकरी बदल सकता है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘क्यूईवा’ (Qiwa): यह पूरी प्रक्रिया ‘मानव संसाधन और सामाजिक विकास मंत्रालय’ (MHRSD) के डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘क्यूईवा’ के माध्यम से होती है, जो पारदर्शिता सुनिश्चित करता है। श्रमिक अपने नए अनुबंध को इलेक्ट्रॉनिक रूप से हस्ताक्षरित कर सकते हैं और नौकरी बदलने की स्थिति में वर्तमान नियोक्ता को स्वचालित रूप से सूचित कर दिया जाता है।

II: देश छोड़ने की आज़ादी।

पहले, किसी भी कर्मचारी को छुट्टी पर घर जाने (री-एंट्री) या नौकरी छोड़कर स्थायी रूप से लौटने (फाइनल एग्जिट) के लिए कफील की लिखित मंज़ूरी आवश्यक थी। यह कफील के हाथ में शोषण का एक शक्तिशाली हथियार था।

पुरानी व्यवस्था (कफाला)नई व्यवस्था (संविदात्मक संबंध)
देश छोड़ने के लिए नियोक्ता (कफील) की पूर्व-अनुमति अनिवार्य थी।कर्मचारी सीधे सरकारी पोर्टल पर आवेदन कर सकता है।

बदलाव:

  1. एग्जिट और री-एंट्री वीज़ा: विदेशी कर्मचारी अब सरकारी सेवाओं के माध्यम से स्वयं ‘एग्जिट और री-एंट्री वीज़ा’ के लिए आवेदन कर सकते हैं। नियोक्ता को इलेक्ट्रॉनिक रूप से सूचित किया जाता है, लेकिन उनकी मंज़ूरी की आवश्यकता नहीं होती है।
  2. फाइनल एग्जिट वीज़ा: अनुबंध समाप्त होने के बाद, श्रमिक नियोक्ता की अनुमति के बिना ‘फाइनल एग्जिट वीज़ा’ के लिए आवेदन करके स्थायी रूप से सऊदी अरब छोड़ सकते हैं।

यह सुधार श्रमिकों को अनिश्चितकाल तक फँसे रहने की स्थिति से बचाता है और उन्हें अपनी मर्ज़ी से स्वदेश लौटने का अधिकार देता है।

III: बेहतर कानूनी सुरक्षा और पारदर्शिता

नए कानून ने श्रमिकों के अधिकारों को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त कानूनी और प्रशासनिक सुरक्षा कवच प्रदान किए हैं:

  • वेतन सुरक्षा प्रणाली (Wage Protection System – WPS): यह एक इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली है जो निजी क्षेत्र के नियोक्ताओं को बैंक के माध्यम से वेतन का भुगतान करने और MHRSD को इसके रिकॉर्ड जमा करने के लिए बाध्य करती है। यदि वेतन में देरी होती है, तो WPS इसे तुरंत चिह्नित करता है और कर्मचारी को नौकरी बदलने का अधिकार मिल जाता है।
  • मानकीकृत अनुबंध: गैर-सऊदी कर्मचारियों के लिए अब एक निश्चित अवधि का लिखित, मानकीकृत रोजगार अनुबंध अनिवार्य है। यह अनुबंध अरबी में होना चाहिए और इसमें वेतन, लाभ और काम के प्रकार जैसे सभी विवरण स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट होने चाहिए।
  • विवाद निवारण: श्रमिकों को अब डर के बिना लेबर कोर्ट और श्रम विवाद निपटान प्रणालियों तक सीधी पहुंच प्राप्त है।
  • प्रोबेशनरी अवधि: प्रोबेशनरी (परिवीक्षा) अवधि की अधिकतम सीमा 180 दिन (6 महीने) तक सीमित कर दी गई है।

4. कितने लोगों को होगा फायदा?

सऊदी अरब के इस सुधार का सीधा प्रभाव देश में कार्यरत प्रवासी श्रमिकों की बड़ी संख्या पर पड़ेगा।

  1. कुल प्रवासी श्रमिक: सऊदी अरब में वर्तमान में 1.3 करोड़ से अधिक विदेशी कामगार हैं। इन सभी को नए श्रम सुधारों से लाभ मिलेगा।
  2. भारतीय कामगारों की संख्या: सऊदी अरब में भारतीय समुदाय सबसे बड़े प्रवासी समूहों में से एक है। आधिकारिक अनुमानों के अनुसार, लगभग 25 लाख से 27 लाख भारतीय नागरिक सऊदी अरब में कार्यरत हैं। कफाला की समाप्ति से सबसे अधिक राहत इन्हीं भारतीय कामगारों को मिलने की उम्मीद है, खासकर उन लोगों को जो निर्माण, सेवा और घरेलू कार्यों में कार्यरत हैं।
  3. आर्थिक लाभ: अनुमान है कि श्रम बाजार में बढ़ी हुई स्वतंत्रता और पारदर्शिता से उत्पादकता बढ़ेगी। श्रमिकों के पास बेहतर वेतन और काम की स्थिति वाले नियोक्ताओं के पास जाने की आज़ादी होगी, जिससे वे शोषण से मुक्त होकर काम कर पाएंगे।

5. वैश्विक प्रतिक्रिया और भविष्य की चुनौतियां।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO), अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संघ परिसंघ (ITUC) और विभिन्न मानवाधिकार संगठनों ने सऊदी अरब के इस कदम का व्यापक स्वागत किया है। इसे खाड़ी क्षेत्र में श्रम अधिकारों की दिशा में एक ‘मील का पत्थर’ और ‘ऐतिहासिक प्रगति’ बताया गया है।

सऊदी अरब से पहले, कतर ने भी FIFA विश्व कप 2022 से पहले इसी तरह के कफाला-उन्मूलन सुधारों की घोषणा की थी, जिससे इस क्षेत्र में अन्य खाड़ी देशों पर भी दबाव बढ़ रहा है।

प्रमुख चुनौतियां।

हालांकि यह सुधार क्रांतिकारी है, ज़मीनी स्तर पर इसकी सफलता कई चुनौतियों पर निर्भर करती है जैसे

  1. घरेलू कामगार (Domestic Workers): यह रिपोर्ट लिखते समय, ये सुधार मुख्य रूप से निजी क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले श्रमिकों पर लागू होते हैं। घरेलू कामगार (हाउस मेड, ड्राइवर आदि), जिनकी संख्या लाखों में है और जो सबसे अधिक असुरक्षित होते हैं, वे अभी भी आंशिक रूप से पुराने नियमों के अधीन हैं। उन्हें पूर्ण सुरक्षा प्रदान करना एक बड़ी चुनौती है।
  2. नियोक्ता की प्रतिरोधक क्षमता: दशकों तक कफाला के तहत पूर्ण नियंत्रण का आनंद लेने वाले नियोक्ताओं के लिए इन बदलावों को स्वीकार करना आसान नहीं होगा। ज़मीनी स्तर पर, नए नियमों को दरकिनार करने या श्रमिकों पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाने की कोशिशें हो सकती हैं।
  3. जागरूकता और शिक्षा: लाखों श्रमिकों, खासकर अशिक्षित वर्ग, को नए नियमों, अपने अधिकारों और क्यूईवा जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करने के बारे में शिक्षित करना एक विशाल कार्य है। भारत सरकार और अन्य संबंधित देशों की सरकारों को इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

6. आज़ादी की नई सुबह।

सऊदी अरब द्वारा कफाला सिस्टम को खत्म करना एक ऐतिहासिक क्षण है। यह न केवल प्रवासी श्रमिकों के लिए मानवीय और कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि सऊदी नेतृत्व 21वीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं को समझता है। यह कदम ‘आधुनिक गुलामी’ के एक अध्याय को समाप्त करता है और एक ऐसे भविष्य का वादा करता है, जहाँ सऊदी अरब का श्रम बाजार अधिक न्यायसंगत, पारदर्शी और आकर्षक होगा।

1.3 करोड़ प्रवासी श्रमिकों, खासकर भारतीय कामगारों के लिए, यह नई सुबह है। अब उनके पास अपना भविष्य खुद तय करने की शक्ति है—एक ऐसी शक्ति, जो कफाला के अंधेरे में दशकों से उनसे छीन ली गई थी।