दिवाली के बाद दिल्ली में ‘दमघोंटू’ प्रदूषण: तथ्य, राजनीति और स्वास्थ्य संकट।

लहर डेस्क
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हर साल दिवाली के बाद वायु प्रदूषण का स्तर खतरनाक सीमा को पार कर जाता है, और इस वर्ष भी स्थिति कमोबेश वैसी ही रही। पटाखों के विस्फोट, धीमी हवा की गति और तापमान में गिरावट के कारण शहर ‘स्मॉग’ की मोटी चादर में लिपट गया, जिससे निवासियों का दम घुटने लगा।
गंभीर होते वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) के तथ्य।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों के अनुसार, दिवाली की रात के बाद दिल्ली-एनसीआर की वायु गुणवत्ता ‘बहुत खराब’ से लेकर ‘गंभीर’ श्रेणी में पहुँच गई।
AQI का स्तर: दिवाली के दिन (इस बार 2025 में 20 अक्टूबर) रात 10 बजे के आसपास जो AQI 344 के आसपास था, वह आधी रात तक 349 तक पहुँच गया। अगले दिन सुबह तक यह 350 से 400 के बीच बना रहा। सबसे प्रदूषित क्षेत्र: बवाना (427), जहांगीरपुरी (407), वज़ीरपुर (408) और बुराड़ी (402) जैसे कई इलाके ‘गंभीर’ (401 से ऊपर) श्रेणी में दर्ज किए गए।
घातक PM2.5: हवा में PM2.5 (सूक्ष्म कण) की सांद्रता कई स्थानों पर 400-600 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुँच गई, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा निर्धारित सुरक्षित वार्षिक औसत (5 माइक्रोग्राम/घन मीटर) से कई गुना अधिक है।
मुख्य कारण: प्रदूषण में आए इस अचानक उछाल के लिए मुख्य रूप से पटाखों के बड़े पैमाने पर फोड़े जाने और मौसम संबंधी प्रतिकूल परिस्थितियों (धीमी हवा की गति और कम तापमान) को जिम्मेदार ठहराया गया है, जिसने प्रदूषक तत्वों को ज़मीन के पास रोक दिया।
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में दिवाली के ठीक बाद वायु गुणवत्ता का ‘गंभीर’ श्रेणी में पहुंचना एक वार्षिक त्रासदी बन गया है। इस वर्ष (2025) में भी, पटाखों के विस्फोट और प्रतिकूल मौसम ने हवा में ज़हर घोल दिया, जिससे नागरिकों को सांस लेने में भारी कठिनाई का सामना करना पड़ा। इस गंभीर स्थिति ने सत्तारूढ़ दल और विपक्षी पार्टियों के बीच तीखी बहस को जन्म दिया है, जिसमें विपक्ष ने मौजूदा प्रदूषण के आंकड़ों के आधार पर सरकार की विफलताओं को उजागर किया है।
इस वर्ष की स्थिति बनाम पिछले वर्ष।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़े बताते हैं कि दिवाली के दिन या उसके तुरंत बाद के वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) में हर साल उतार-चढ़ाव आता रहा है, जो मुख्य रूप से प्रतिबंधों की सख्ती और मौसम की परिस्थितियों पर निर्भर करता है:
| वर्ष | दिवाली के दिन का औसत AQI | श्रेणी |
|---|---|---|
| 2021 | 382 | बहुत खराब (सर्वाधिक) |
| 2022 | 312 | बहुत खराब |
| 2023 | 218 | खराब (अपेक्षाकृत बेहतर) |
| 2024 | 330 | बहुत खराब |
| इस वर्ष (2025) | 344 (रात 10 बजे) | बहुत खराब |
इस वर्ष की गंभीर स्थिति: 2025 में, दिवाली के दिन का AQI 344 (बहुत खराब) दर्ज किया गया। हालाँकि, दिवाली की अगली सुबह, कई निगरानी स्टेशनों, जैसे कि बवाना (427), जहांगीरपुरी (407), और वज़ीरपुर (408) पर यह आंकड़ा 400 की सीमा को पार करते हुए ‘गंभीर’ श्रेणी में पहुंच गया। विपक्ष ने इसी ‘गंभीर’ श्रेणी के आँकड़े पर ज़ोर देते हुए दावा किया कि सरकार का नियंत्रण पूरी तरह विफल रहा है। PM2.5 (सूक्ष्म कण) की सांद्रता कई इलाकों में WHO के सुरक्षित स्तर से 100 गुना अधिक पाई गई, जो इसे 2021 के बाद सबसे खतरनाक स्थितियों में से एक बनाती है।
सियासी घमासान में विपक्ष का पलटवार।

प्रदूषण बढ़ने के बाद, दिल्ली की सत्तारूढ़ और विपक्षी पार्टियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया।
मुख्यमंत्री का दावा: ‘स्थिति बेहतर’
सत्तारूढ़ दल की ओर से मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने पिछले वर्षों के डेटा का हवाला देते हुए दावा किया कि इस वर्ष की दिवाली के बाद का AQI पिछली सरकारों के कार्यकाल से बेहतर है और प्रदूषण में कमी आई है। उन्होंने कहा कि सरकार प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है।

प्रतिबंध लागू करने में सरकार विफल।
विपक्षी दल आम आदमी पार्टी (AAP) ने मुख्यमंत्री के ‘बेहतर’ स्थिति के दावे को खोखला बताते हुए मौजूदा सरकार पर तीखा हमला किया। विपक्ष ने इस वर्ष के 400+ AQI को सरकार की विफलता का सीधा प्रमाण बताया।
- अवैध पटाखा लॉबी से सांठगांठ: AAP के नेताओं ने सीधे तौर पर सत्तारूढ़ दल पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा,”अब यह लगभग निश्चित है कि करोड़ों रुपये की ‘पटाखा लॉबी’ के साथ समझौता है। सरकार अवैध पटाखों की बिक्री रोकने में पूरी तरह नाकाम रही, जिसके कारण प्रतिबंध केवल कागज़ों तक सीमित रहे।”
- आंकड़ों को छिपाने का प्रयास: विपक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार वास्तविक प्रदूषण के आंकड़ों को जनता से छिपा रही है, और कई निगरानी स्टेशनों से डेटा को गायब करने या उसमें हेरफेर करने की कोशिश की गई, ताकि संकट की भयावहता कम लगे।
- पराली के तर्क को ख़ारिज: जब सत्तारूढ़ दल के मंत्रियों ने प्रदूषण के लिए पंजाब में पराली जलाने को दोषी ठहराया, तो विपक्ष ने पलटवार करते हुए कहा कि दिवाली के ठीक बाद प्रदूषण में आया अचानक उछाल मुख्य रूप से स्थानीय स्रोतों (पटाखों) के कारण होता है, न कि दूर-दराज की पराली के धुएं से।

संक्षेप में, विपक्ष ने तर्क दिया कि प्रतिबंधों की अनुमति या आंशिक अनुमति देने के बाद, उन्हें सख्ती से लागू न कर पाना ही इस ‘गंभीर’ श्रेणी के प्रदूषण का मुख्य कारण है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं के विचार।
पर्यावरण और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी राजनीतिक खींचतान पर निराशा व्यक्त की और कड़े नियमों के उल्लंघन को समस्या की जड़ बताया। दिल्ली स्थित पर्यावरण कार्यकर्ता भावरीन कंधारी ने सवाल उठाया कि “जब आप पहले से प्रदूषित शहर में पटाखों की सीमित अनुमति देते हैं, तो नियमों का पालन कैसे सुनिश्चित करेंगे? रात 10 बजे की समयसीमा के बाद भी पटाखे लगातार फूटते रहे, और इसका नतीजा यह है कि हमारी हवा इतनी खतरनाक हो गई।”
सामाजिक सेवा संगठनों ने जोर दिया कि जब तक सड़कों की धूल, निर्माण गतिविधियों और ठोस अपशिष्ट को जलाने जैसे स्थानीय स्रोतों पर नियंत्रण नहीं किया जाता, तब तक केवल दोषारोपण से हवा साफ नहीं होगी।
रोगियों की बढ़ती भीड़।

प्रदूषण के ‘गंभीर’ स्तर ने दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था पर तत्काल दबाव डाला है।
- अस्पतालों में 30% तक वृद्धि: चिकित्सकों के अनुसार, पिछले कुछ दिनों में सांस और श्वसन संबंधी बीमारियों से पीड़ित मरीजों की संख्या में ओपीडी में 25% से 30% तक की वृद्धि हुई है।
- विकट स्थिति: अस्थमा, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD), और ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियों के पुराने मरीजों की हालत खराब हो गई है, कई को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ रहा है।
- डॉक्टरों की सलाह: यथार्थ हॉस्पिटल के पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. हरीश भाटिया ने चेतावनी दी है कि बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, और लोगों को जब तक अत्यंत आवश्यक न हो, घर के अंदर ही रहना चाहिए और N95 मास्क का उपयोग करना चाहिए।
निष्कर्ष: इस वर्ष की दिवाली ने एक बार फिर साबित कर दिया कि प्रदूषण के मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी हावी है, जबकि आवश्यक कार्रवाई की कमी है। विपक्ष के दावे और ऐतिहासिक तुलना यह दर्शाते हैं कि प्रदूषण नियंत्रण के प्रयासों में बड़ी खामियां हैं, और इसका सीधा खामियाजा दिल्ली के नागरिकों को, विशेषकर रोगियों को, अपने स्वास्थ्य से चुकाना पड़ रहा है।