दिवाली: दीपों का पर्व — इतिहास, महत्व और बदलती परंपराएँ।

लहर डेस्क
भारत में जब कार्तिक मास की अमावस्या आती है, तो पूरा देश रोशनी में नहा उठता है। गाँवों की गलियों से लेकर महानगरों की सड़कों तक, दीपों की कतारें जैसे कहती हैं — “अंधकार चाहे जितना गहरा हो, एक दीपक काफी है।”
‘दीपावली’ शब्द संस्कृत के दो शब्दों से बना है — ‘दीप’ अर्थात दीपक और ‘आवली’ अर्थात श्रृंखला। इसका अर्थ है दीपकों की पंक्ति, पर इसका भाव इससे कहीं अधिक गहरा है — यह त्योहार अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव है।
1. दिवाली क्यों मनाई जाती है?
1.1 भगवान राम की अयोध्या वापसी
सबसे लोकप्रिय कथा के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीराम 14 वर्ष का वनवास पूरा करके और रावण पर विजय प्राप्त कर अयोध्या लौटे थे। अयोध्यावासियों ने अपने प्रिय राजा के स्वागत में पूरे नगर को दीपों से रोशन कर दिया था। यह क्षण था — अच्छाई की जीत और जन-आनंद के संगम का।

1.2 देवी लक्ष्मी का जन्म और विवाह
हिंदू मान्यता है कि कार्तिक अमावस्या के दिन समुद्र मंथन के दौरान देवी लक्ष्मी का जन्म हुआ था। इसीलिए इस दिन उनकी पूजा होती है ताकि घर में सुख-समृद्धि और धन का आगमन हो।
एक अन्य कथा कहती है कि इसी दिन देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में चुना, इसलिए दिवाली का दिन विवाह-सौभाग्य से भी जुड़ा है।
1.3 अन्य धार्मिक और ऐतिहासिक अर्थ
- जैन धर्म में दिवाली भगवान महावीर के निर्वाण दिवस के रूप में मनाई जाती है।
- सिख धर्म में इसे बंदी छोड़ दिवस कहा जाता है — जब गुरु हरगोविंद जी मुगल सम्राट की कैद से मुक्त हुए थे।
- दक्षिण भारत में यह दिन भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर वध से जुड़ा है।
इन सब कथाओं का सार एक है — प्रकाश हमेशा अंधकार पर विजयी होता है।
2. दीये और आतिशबाजी — परंपराएँ और विकास
2.1 दीपों की परंपरा

दिवाली की सबसे पुरानी पहचान मिट्टी के दीयों की रही है। बिजली के बल्बों से पहले यही दीये रोशनी का प्रतीक थे — घर, आंगन, छत, दरवाज़े, यहाँ तक कि गाँव की पगडंडियाँ तक दीपों से जगमगाती थीं।
2.2 पटाखों की शुरुआत
आतिशबाजी की परंपरा भारत में बाद में आई।
बारूद का आविष्कार चीन में हुआ और व्यापार-संपर्कों के माध्यम से 13वीं-15वीं शताब्दी में भारत पहुँचा।
पहली बार इसका उल्लेख विजयनगर साम्राज्य (15वीं शताब्दी) में मिलता है, जबकि मुगल काल, विशेष रूप से अकबर के समय, आतिशबाजी उत्सवों का प्रमुख हिस्सा बन गई थी।
धीरे-धीरे यह परंपरा आम लोगों तक पहुँची और 19वीं शताब्दी में शिवकाशी (तमिलनाडु) में पटाखों का उद्योग विकसित हुआ।
3. आज़ादी से पहले की दिवाली

ब्रिटिश राज के दौर में भी दिवाली उल्लासपूर्ण थी, पर थोड़ी भिन्न।
- बिजली नहीं थी, इसलिए दीयों की कोमल रोशनी ही सब कुछ थी।
- आतिशबाजी सीमित थी, केवल अमीरों तक।
- व्यापारी समुदाय इस दिन नया बही-खाता खोलते थे — यह परंपरा आज भी जारी है।
- सामाजिक एकता का भाव प्रबल था — यह त्योहार लोगों को एक साथ लाता था, विशेषकर विदेशी शासन के समय, जब सांस्कृतिक एकजुटता स्वयं एक प्रतिरोध थी।
4. आज की दिवाली
4.1 शहर और गाँव की दिवाली

आज शहरों में रंग-बिरंगी लाइट्स, LED की सजावट और पटाखों की गूंज है।
वहीं गाँवों में अभी भी मिट्टी के दीये, हाथों से बनाई रंगोली और सामूहिक पूजा की परंपरा जीवित है।
अब लोग “ग्रीन दिवाली” जैसे विचारों को अपनाने लगे हैं — कम पटाखे, पर्यावरण-संवेदनशील उत्सव और स्थानीय उत्पादों का उपयोग।
4.2 बदलते सामाजिक अर्थ
दिवाली अब केवल घर की सफाई और मिठाई बाँटने का पर्व नहीं रह गई है।
यह बन गई है समाज में बाँटने, देने और साझा करने की भावना का प्रतीक।
कई स्वयं-सहायता समूह (SHG) की महिलाएँ दीये, मोमबत्तियाँ, थैलियाँ और पूजा-सामग्री बनाकर अपनी आजीविका से जोड़ रही हैं।
5. अनुभवों की रोशनी

5.1 बेटी की आत्मनिर्भरता “मेरे पिता मुझे शादी से पहले कभी काम करने नहीं देते थे। लेकिन इस दिवाली मैंने उन्हें सरप्राइज़ दिया — अपने हाथों से सुंदर लालटेने बनाईं। अब हम दोनों दुकान पर साथ बैठते हैं और अच्छी बिक्री देखकर लगता है कि मैं भी परिवार की रोशनी का हिस्सा हूँ।”
— मुंबई की एक युवती
यह दिखाता है कि दिवाली अब रिश्तों के संवाद और महिला सशक्तिकरण का भी प्रतीक बन रही है।
5.2 डॉक्टर की यादगार दिवाली “साल 2006 में मैं अकेला था, टूट चुका था, और लोग मेरे बोलने के तरीके का मज़ाक उड़ाते थे। लेकिन उन्हीं अनुभवों ने मुझे सिखाया कि असली रोशनी भीतर से आती है — मजबूती और सहानुभूति से।”
— डॉ. पाल, कोलकाता
यह याद दिलाती है कि दीपावली केवल उत्सव नहीं, आत्म-चेतना का भी पर्व है।
5.3 सामुदायिक दिवाली “हमारे मोहल्ले में इस बार किसी ने पटाखे नहीं चलाए। सबने मिलकर गलियों में दीये सजाए, बच्चों के साथ कार्यक्रम किया। जो सुकून था, वो किसी आतिशबाजी से नहीं मिल सकता।”
— जयपुर की मीना चौधरी, सामाजिक कार्यकर्ता
यह दिखाता है कि नई पीढ़ी शोर से ज़्यादा शांति, और उपभोग से ज़्यादा सहयोग को महत्व देने लगी है।
5.4 कुम्हार परिवार की मिट्टी और रोशनी

“हमारे लिए दिवाली तब शुरू होती है जब पहली बार चाक पर मिट्टी रखी जाती है,”
बीकानेर जिले के कोलायत गाँव के कुम्हार रामू लाल कहते हैं।
“हम पूरे साल इस त्यौहार का इंतज़ार करते हैं क्योंकि इसी समय सबसे ज़्यादा दीये बिकते हैं। बच्चे भी साथ बैठकर रंग भरते हैं — लाल, पीला, नीला। जब कोई हमारे दीये लेकर जाता है, तो लगता है जैसे हमारी मेहनत की रोशनी उसके घर तक जा रही है।”
उनकी पत्नी पार्वती देवी मुस्कराती हैं — “पहले तो लोग प्लास्टिक के दीये लेने लगे थे, हमें डर था कि हमारी कला खत्म न हो जाए। अब फिर लोग कहते हैं — ‘भाभी, मिट्टी के देसी दीये चाहिए।’ तब लगता है, परंपरा अभी ज़िंदा है।”
यह कहानी बताती है कि दिवाली की असली चमक बाज़ार की बिजली में नहीं, बल्कि उन हाथों की मिट्टी में है जो अंधेरे को उजाले में बदलते हैं।
दीये का अर्थ।
दिवाली सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की रोशनी है।
हर दीपक हमें याद दिलाता है कि —
- अंधकार कभी स्थायी नहीं होता।
- उम्मीद का एक दीया भी काफी है।
- और असली दिवाली तब होती है, जब हम किसी और के जीवन में उजाला भरते हैं।
लहर हिंदी परिवार की ओर से आप सभी को — रोशनी, संवेदना और साझा खुशी की शुभकामनाएँ!