अगर किशनगंगा का पानी वारसन पहुँचे, तो कुपवाड़ा की प्यास मिट सकती है।

चौधरी मोहम्मद अय्यूब कटारिया
वारसन, कुपवाड़ा, कश्मीर
कुपवाड़ा के पहाड़ी रास्तों पर जब दोपहर की धूप सिर पर चढ़ती है, तो गांवों के रास्ते पर एक ही दृश्य आम होता है। कि सिर पर मटके, पीठ पर कैन और हाथों में बाल्टी लिए औरतें और बच्चे, जो कई किलोमीटर दूर तक पानी की तलाश में जाते हैं।
यह दृश्य सिर्फ़ एक दिन का नहीं, बल्कि कुपवाड़ा की रोज़मर्रा की हकीकत है।
जम्मू-कश्मीर के इस उत्तरतम जिले में, जहां बर्फीली हवाएँ और हरे-भरे जंगल हैं, वहीं पीने के पानी की समस्या लोगों की ज़िंदगी का सबसे बड़ा बोझ बन चुकी है।
वारसन, त्रेहगाम, क्रालपोरा, कादराबाद — ये वे नाम हैं जो हर साल गर्मियों में एक ही आवाज़ में गूंजते हैं। “हमें पानी चाहिए।”
हम थक चुके हैं पानी ढूंढते-ढूंढते।

वारसन के चौधरी मोहम्मद महबूब कटारिया बताते हैं, कि “हमारे इलाके में पानी की ऐसी किल्लत है कि लोग रोज़ मीलों पैदल चलकर दूर के झरनों और नालों से पानी लाते हैं। कई बार तो बच्चों को स्कूल भेजने से पहले यही सोचना पड़ता है कि घर के लिए पानी कैसे आएगा।”
महबूब का मानना है कि अगर “जुम्मा घुंड” नामक स्रोत का पानी इरिगेशन लिफ्ट के ज़रिए वारसन की सीमा तक लाया जाए, तो न सिर्फ़ वारसन, बल्कि पूरा कुपवाड़ा जिला इस समस्या से मुक्त हो सकता है।
वे बताते हैं कि “कुपवाड़ा के पास अपनी प्यास बुझाने का सबसे टिकाऊ हल यही है। कि किशनगंगा का पानी जुम्मा घुंड से उठाकर लाना। इससे क्रालपोरा, त्रेहगाम और कादराबाद ब्लॉक की पूरी आबादी को स्थायी राहत मिल सकती है।”
सालों से जारी जद्दोजहद।
यह मुद्दा नया नहीं है। पिछले कई सालों से इस बारे में बातचीत चल रही है। गांव के चौपालों से लेकर पंचायत की बैठकों तक, और नेताओं के दफ्तरों तक।
स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि जब महबूबा मुफ्ती जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री थीं, तब इस इलाके के प्रसिद्ध गूर्जर नेता चौधरी सलामुद्दीन बजाड़ ने उन्हें वारसन आने का न्योता दिया था।
“उन्होंने खुद आकर हमारी बात सुनी थी,” महबूब याद करते हैं, कि “और हमने सबसे पहले यही मांग रखी थी कि किशनगंगा का पानी जुम्मा घुंड से लिफ्ट के ज़रिए हमारे इलाके तक पहुंचाया जाए। महबूबा जी ने भरोसा दिलाया था कि वे इस मांग को पूरा करेंगी, लेकिन कुछ ही समय बाद सरकार गिर गई और बात वहीं ठहर गई।”
सरकारी फाइलों में अटका पानी।

कुपवाड़ा की यह कहानी केवल एक जिले की नहीं है यह उस व्यवस्था की भी कहानी है जिसमें लोगों की बुनियादी ज़रूरतें अक्सर फाइलों और वादों के बीच अटक जाती हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले दो दशकों में कई योजनाओं की घोषणाएँ हुईं, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
कई बार पाइपलाइनें बिछाईं गईं, लेकिन उनमें पानी कभी नहीं बहा।
त्रेहगाम ब्लॉक की रहने वाली साबरा बेगम बताती हैं, कि “सरकार कहती है हर घर जल, लेकिन हमारे गांव में पाइप तो है, पानी नहीं। बच्चे पानी के बिना स्कूल जाते हैं, और महिलाएँ हर दिन पानी की लड़ाई लड़ती हैं।”
किशनगंगा, एक उम्मीद की नदी।

किशनगंगा नदी, जो लोलाब और कुपवाड़ा की पहाड़ियों से बहती हुई पाकिस्तान की सीमा की ओर निकल जाती है, इस इलाके के लिए जीवनरेखा बन सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इसका एक हिस्सा लिफ्ट सिस्टम के ज़रिए वारसन की ओर मोड़ा जाए, तो तीन ब्लॉकों — क्रालपोरा, त्रेहगाम और कादराबाद — की पूरी आबादी को स्वच्छ और स्थायी जल-स्रोत मिल सकता है।
स्थानीय इंजीनियरों ने पहले भी इस दिशा में प्रारंभिक अध्ययन किया था।
परियोजना की तकनीकी जटिलताएँ हैं, लेकिन असंभव नहीं।
लोगों की मांग है कि सरकार इस पर दोबारा गौर करे और इसे “रीजनल वाटर रीवाइवल मिशन” के रूप में अपनाए।
राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी।
वारसन के निवासियों का कहना है कि अब यह मसला सिर्फ़ तकनीकी नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति का भी है।
महबूब कटारिया कहते हैं। कि “हमारे पास स्रोत है, हमारे पास तकनीकी रास्ता भी है। बस ज़रूरत है सरकार के ध्यान और निर्णय की।”
इस क्षेत्र के विधायक मीर सैफुल्लाह से भी लोगों ने बार-बार अपील की है कि इस मसले को विधानसभा में उठाया जाए।
“हमारी यह बुनियादी मांग है,” गांव के लोग कहते हैं कि “हमें सड़कों से ज़्यादा पानी की ज़रूरत है। क्योंकि सड़कें तो सूखे में धूल उड़ाती हैं, लेकिन पानी ज़िंदगी देता है।”
महिलाओं की आवाज़।

इस इलाके में पानी की समस्या सिर्फ़ सेहत या सुविधा का नहीं, बल्कि इज़्ज़त और सुरक्षा का भी सवाल बन चुकी है।
हर सुबह, जब सूरज उगता है, तो गांव की महिलाएँ बाल्टियाँ और कैन लेकर निकल पड़ती हैं।
उन्हें कई बार घने जंगलों और सुनसान रास्तों से होकर जाना पड़ता है — जहाँ जंगली जानवरों और कभी-कभी बदमाशों का भी डर रहता है।
गांव की महिला रुखसाना कहती हैं, कि “पानी हमारे लिए इज़्ज़त का भी सवाल है। अगर घर में पानी न हो, और कोई मेहमान आ जाए तो शर्म महसूस होती है। दूसरी ओर हमारी बेटियों की पढ़ाई भी प्रभावित होती है क्योंकि उन्हें रोज़ पानी भरने जाना पड़ता है।”
रुखसाना की बातों में एक ऐसी सच्चाई झलकती है, जो आंकड़ों में नहीं दिखती। पानी की कमी सिर्फ़ प्यास नहीं बढ़ाती, यह समाज की प्रगति को भी रोक देती है।
आवाज़ें जो अब थमनी नहीं चाहिए।
आज जब पूरा देश “जल जीवन मिशन” और “हर घर नल” की बातें कर रहा है, तब कुपवाड़ा की यह आवाज़ हमें याद दिलाती है कि योजनाएँ कागज़ पर नहीं, ज़मीन पर भी दिखनी चाहिए। यहां के लोग बार-बार सरकार से अपील कर चुके हैं।
गांव-गांव में पंचायत प्रस्ताव पास किए गए, स्थानीय प्रतिनिधियों को ज्ञापन सौंपे गए, और मीडिया के ज़रिए भी यह मुद्दा उठाया गया।
फिर भी, वारसन की पहाड़ियों में आज भी औरतों की टोलियाँ रोज़ बाल्टियाँ लेकर निकलती हैं।
उनके पाँवों की पगडंडियाँ अब पथरीली नहीं, बल्कि उम्मीदों से भरी हैं। उम्मीद है कि कभी न कभी उनके घरों में भी नल से साफ़ पानी बहेगा।
“सरकार बस थोड़ा गौर करे…”

वारसन के एक बुजुर्ग धीरे से कहते हैं,कि “अगर सरकार थोड़ा ध्यान दे, तो सबसे बड़ा मुद्दा हल हो सकता है।”
यह एक साधारण वाक्य है, लेकिन इसमें सालों की थकान, उम्मीद और जिद — सब कुछ समाई हुई है।
कुपवाड़ा के लोग जानते हैं कि उन्हें अब भी लंबा इंतज़ार करना पड़ सकता है,
लेकिन वे हार नहीं मान रहे।
उनकी लड़ाई सिर्फ़ पानी की नहीं — अपनी ज़मीन, जीवन और सम्मान के अधिकार की लड़ाई है।
जनता की पहल और सरकार का साथ।
अगर किशनगंगा का पानी जुम्मा घुंड से वारसन तक लाने की पहल सरकार करती है, तो यह न सिर्फ़ एक जल योजना होगी,
बल्कि यह उत्तर कश्मीर के हज़ारों परिवारों के जीवन में स्थायी बदलाव की शुरुआत होगी।
क्योंकि जहां पानी होता है,
वहीं ज़िंदगी बहती है —
और कुपवाड़ा अब अपनी ज़िंदगी को फिर से बहता देखना चाहता है।