लद्दाख में उठती आवाज़, सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी और आंदोलन की गहराई।

लेह, लद्दाख से लहर हिंदी की स्पेशल रिपोर्ट।
“हम तो बस अपनी ज़मीन और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा चाहते हैं। अगर इसके लिए आवाज़ उठाना गुनाह है, तो हाँ, हम सब गुनहगार हैं।”
लेह के मेन बाज़ार में खड़ी 60 वर्षीय महिला, ताशी डोलमा, की आँखें भर आईं। उनकी आवाज़ में गुस्सा और चिंता दोनों झलक रहे थे।
पिछले हफ़्ते लद्दाख की सड़कों पर गूंजे नारों ने पूरे देश का ध्यान खींच लिया। सोनम वांगचुक, जलवायु कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक, को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। आरोप यह कि उनके भाषणों ने युवाओं को हिंसा के लिए उकसाया। लेकिन स्थानीय लोग मानते हैं कि यह गिरफ्तारी आंदोलन की आवाज़ दबाने की कोशिश है।
भूख हड़ताल से हिंसा तक।

सोनम वांगचुक लगातार 15 दिन से भूख हड़ताल पर थे। उनका कहना था कि लद्दाख की पहचान और पर्यावरण की रक्षा तभी संभव है जब इसे राज्य का दर्जा मिले और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किया जाए।
24 सितंबर की शाम हालात अचानक बिगड़े। दो भूख हड़तालियों की हालत गंभीर होने पर उन्हें अस्पताल ले जाया गया। इसके बाद बड़ी संख्या में युवा सड़कों पर उतरे। कुछ गुस्से में सरकारी दफ़्तरों और एक राजनीतिक दल के दफ्तर तक पहुँच गए। वहां आगजनी और पत्थरबाज़ी हुई। इसी हिंसा में चार लोग मारे गए और कई घायल हुए। स्थानीय व्यापारी रिगज़िन नोरबू ने कहा कि “हमारा इरादा कभी भी हिंसा का नहीं था। यह हमारी संस्कृति में ही नहीं है,” उन्होंने मीडिया से आगे कहा कि सोनम वांगचुक ने तुरंत अपनी भूख हड़ताल समाप्त कर दी और हिंसा की निंदा की। “हमारी लड़ाई हमेशा शांतिपूर्ण रही है,”
राजनीतिक छवि और विवाद।

सोनम वांगचुक का राजनीतिक सफर उतना ही पेचीदा रहा है जितना उनके आंदोलनों का। कई सालों तक वह बीजेपी और सरकार की तारीफ़ करते रहे और इसी वजह से उन्हें सत्ता पक्ष का चहेता माना जाता था।
लेकिन जैसे ही उन्होंने अदानी समूह को दिए जाने वाले सोलर प्रोजेक्ट पर सवाल उठाया, उनकी छवि पूरी तरह बदल गई। मीडिया और कुछ राजनीतिक धड़ों ने उन्हें विलेन, यहां तक कि देशद्रोही तक बता दिया।
स्थानीय लोग बताते हैं कि “जब तक उन्होंने केवल सरकार की तारीफ़ की, उन्हें समर्थक माना गया। जैसे ही उन्होंने शक्तिशाली आर्थिक समूहों की आलोचना की, वही लोग उन्हें सबसे बड़ा खतरा समझने लगे।”
सरकार का रुख।
लद्दाख प्रशासन और केंद्र सरकार ने आरोप लगाया कि सोनम वांगचुक के भाषणों ने भीड़ को भड़काया। गृह मंत्रालय ने कहा कि उन्होंने “अरब स्प्रिंग” और “नेपाल के युवा आंदोलनों” का हवाला देकर हिंसा को प्रेरित किया।
साथ ही, सरकार ने उनकी संस्था SECMOL का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया और वित्तीय गड़बड़ियों के आरोप लगाए। पुलिस ने यह भी कहा कि वे “विदेशी लिंक” की जांच कर रहे हैं।
गिरफ्तारी के बाद वांगचुक को जोधपुर सेंट्रल जेल में रखा गया।
स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया।

लद्दाख की जनता इन आरोपों को खारिज कर रही है। लेह एपेक्स बॉडी के एक प्रतिनिधि ने कहा कि
“सोनम वांगचुक ने हमेशा गांधीवादी तरीके अपनाए हैं। उनका नाम हिंसा से जोड़ना सच्चाई को पलटना है।”
वांगचुक की पत्नी डॉ गितांजलि अंगमो ने कहा कि “ये सब मनगढ़ंत आरोप हैं। वे जीवन भर शांति और पर्यावरण की रक्षा के लिए लड़े हैं। उनके भाषण को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है।”
दिल्ली और राष्ट्रीय राजनीति की प्रतिक्रिया।
वांगचुक की गिरफ्तारी ने दिल्ली में भी बहस छेड़ दी। संसद भवन के बाहर विपक्षी दलों ने प्रदर्शन किया और सरकार पर लोकतांत्रिक आवाज़ दबाने का आरोप लगाया।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ट्वीट किया कि “सोनम वांगचुक जैसे शांतिपूर्ण कार्यकर्ताओं को जेल में डालना सरकार की असुरक्षा और अहंकार को दर्शाता है।”
आप सांसद संजय सिंह ने कहा कि “यह सिर्फ लद्दाख का मुद्दा नहीं है, यह पूरे भारत के लोगों के अधिकारों का सवाल है।”
वहीं भाजपा के नेताओं ने कहा कि “कानून-व्यवस्था से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”
पर्यावरण कार्यकर्ताओं और युवा आंदोलन।

दिल्ली, बेंगलुरु और पुणे में पर्यावरण संगठनों ने सॉलिडैरिटी मार्च निकाला। युवा कार्यकर्ता दीया शर्मा ने कहा कि “अगर पर्यावरण की रक्षा की मांग करना देश विरोध है, तो फिर हम सबको जेल में डाल दीजिए। सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी सिर्फ लद्दाख नहीं, पूरे भारत के पर्यावरण आंदोलनों पर हमला है।”
जलवायु वैज्ञानिक सुनीता नारायण ने कहा कि “लद्दाख जैसी नाज़ुक जगह पर जनता की बात सुने बिना विकास थोपना आत्मघाती होगा। सरकार को दमन की बजाय संवाद का रास्ता चुनना चाहिए।”
लद्दाख आंदोलन की टाइमलाइन: 2019–2025
अगस्त 2019: अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन। लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा, लेकिन बिना विधानसभा।
2020: स्थानीय संगठनों ने चेतावनी दी कि बिना संवैधानिक सुरक्षा लद्दाख की ज़मीन, पर्यावरण और संस्कृति खतरे में है।
2021: लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) का गठन। राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची की मांग।
2022: कई दौर की बातचीत केंद्र सरकार और स्थानीय नेताओं के बीच। कोई ठोस परिणाम नहीं।
2023: सोनम वांगचुक की ठंड में भूख हड़ताल। देशभर का ध्यान।
2024: कई शांतिपूर्ण धरने और मार्च। आंदोलन मजबूत हुआ।
सितंबर 2025: भूख हड़ताल के दौरान हिंसा भड़की। चार लोगों की मौत। वांगचुक को NSA के तहत गिरफ्तार।
सीमाओं, पारिस्थितिकी और लोकतंत्र पर असर।

लद्दाख की संवेदनशील सीमाएँ (चीन और पाकिस्तान) इस आंदोलन को सुरक्षा के दृष्टिकोण से और जटिल बनाती हैं।
सीमा सुरक्षा: राज्य का दर्जा और स्थानीय प्रशासन का नियंत्रण बढ़ाने की मांग, सीमाई सुरक्षा रणनीति पर असर डाल सकती है।
पारिस्थितिकी: हिल्स और ग्लेशियर क्षेत्र के विकास को नियंत्रित करना आवश्यक है। बिना स्थानीय प्रतिनिधित्व के बड़े प्रोजेक्ट पर्यावरणीय जोखिम बढ़ा सकते हैं।
लोकतंत्र: शांति से आवाज़ उठाने वाले कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर सवाल खड़ा करती है।
राजनीतिक दृष्टिकोण: यह मामला दिखाता है कि कैसे सत्ता पक्ष के प्रति आलोचना से किसी की छवि बदल सकती है। सत्ता का समर्थन करने वाले चहेते कार्यकर्ता, जैसे ही किसी बड़े आर्थिक समूह या नीति पर सवाल उठाते हैं, उन्हें विरोध और आरोपों का सामना करना पड़ता है।
लोकल कहानियाँ और अनुभव।
ताशी डोलमा, 60: “हमारे बच्चे बर्फ और पानी के संकट में हैं। सोनम वांगचुक ने हमें आवाज़ दी, यह अपराध नहीं है।”
रिगज़िन नोरबू, व्यापारी: “हमारे घरों और दुकानों को नुकसान पहुंचा, लेकिन वांगचुक ने शांति की अपील की।”
ज़ाकिर हुसैन, छात्र: “जब तक हमारी धरती सुरक्षित नहीं, हमारी आवाज़ बंद नहीं होगी।”
फिलहाल लेह के कई हिस्सों में कर्फ्यू और इंटरनेट पाबंदियां लगी हुई हैं। सुरक्षा बल तैनात हैं और हालात पर नज़र रखी जा रही है।
लेकिन जनता का गुस्सा थमा नहीं है। लोग पूछ रहे हैं कि “क्या अपनी धरती और अपने भविष्य की सुरक्षा की मांग करना देश विरोध है?”
सवाल गहरे हैं और जवाब अभी भी अधूरे।