ज़मीन पर किसका हक़ ???

गरीबों के लिए ज़मीन नहीं, कारपोरेट के लिए दरवाज़े खुले


भागलपुर से एम. अख़लाक की रिपोर्ट।


बिहार सरकार की कथनी और करनी में फर्क का ताज़ा सबूत सामने आया है। अदाणी पावर लिमिटेड को 2400 मेगावाट का थर्मल पावर प्लांट लगाने के लिए 1050 एकड़ ज़मीन और लगभग 10 लाख पेड़ सिर्फ एक रुपये वार्षिक किराए पर 33 साल के लिए लीज पर दे दिए गए हैं। कहा जा रहा है कि इस परियोजना से 25 से 29 हज़ार करोड़ रुपये तक का निवेश होगा।

लेकिन असली सवाल निवेश का नहीं है। असली सवाल यह है कि सरकार की प्राथमिकताएँ कहाँ हैं?

याद कीजिए—यही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विधानसभा में गर्व से कह रहे थे कि “बिहार में भूमिहीनों को देने के लिए ज़मीन ही नहीं है।” यह बयान उस समय दिया गया था जब भाकपा (माले) के विधायक भूमिहीनों को ज़मीन देने की मांग कर रहे थे। यानी गरीबों और दलित-भूमिहीन किसानों के लिए तो राज्य में ज़मीन नहीं है, लेकिन एक कारपोरेट घराने को एक ही झटके में हज़ारों एकड़ ज़मीन और लाखों पेड़ों का जंगल मिल जाता है—वह भी एक रुपये वार्षिक किराए पर।

क्या यह महज़ संयोग है? या फिर सत्ता और पूँजी के बीच का खुला गठबंधन?

पारदर्शिता का दावा और छुपे सवाल।

सरकार कह रही है कि यह सौदा सार्वजनिक निविदा के तहत हुआ है, इसलिए सब कुछ पारदर्शी है। लेकिन सवाल यह है कि

  • क्या ज़मीन का मूल्यांकन बाज़ार की दरों पर किया गया?
  • क्या भूमिहीनों, किसानों और पर्यावरण पर पड़ने वाले असर का आकलन हुआ?
  • जब सरकार खुद मानती है कि उसके पास भूमिहीनों को देने लायक ज़मीन नहीं है, तो किसी कारपोरेट को इतनी ज़मीन औने-पौने में क्यों?

यह सिर्फ़ एक निवेश सौदा नहीं, बल्कि नीति और नीयत दोनों का नैतिक दिवालियापन है।

विकास का ठेका सिर्फ़ पूँजीपतियों को?

सरकार का तर्क है कि इस प्रोजेक्ट से बिजली पैदा होगी, रोजगार मिलेगा और बिहार औद्योगिक विकास की ओर बढ़ेगा। लेकिन सवाल उठता है। कि हर बार विकास का ठेका सिर्फ़ बड़े पूँजीपतियों को ही क्यों दिया जाता है?
क्यों नहीं वही ज़मीन और संसाधन छोटे किसानों, सहकारी समितियों या स्थानीय उद्योगों को मिलते, जिससे असल में स्थानीय रोज़गार और समान वितरण का लक्ष्य पूरा हो सके?

10 लाख पेड़ों की कटाई सिर्फ पर्यावरण का नुकसान नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि सरकार के लिए अब जंगल और ज़मीन सिर्फ़ पूंजी के कच्चे माल में बदल चुके हैं। यही वह बिहार है, जहाँ पलायन रोकने के लिए योजनाएँ कागज़ पर तो बनती हैं, पर ज़मीन पर हमेशा ज़मीन की कमी का बहाना सुनाई देता है।

नीतीश कुमार और सामाजिक न्याय का दावा।

नीतीश कुमार अक्सर कहते हैं कि वे सामाजिक न्याय और विकास के बीच संतुलन बनाते हैं। लेकिन अदाणी को ज़मीन देने का यह सौदा साफ़ दिखाता है कि सरकार की नीतियों का झुकाव किस तरफ़ है। भाजपा-जदयू गठबंधन की यह कार्रवाई बताती है कि सत्ता में चाहे जो भी हो, बड़े कारपोरेट हितों के सामने बिहार के गरीबों की आवाज़ हमेशा कमजोर पड़ जाती है।

जनता का सवाल।

बिहार की जनता अब यह पूछ रही है कि

  • क्या राज्य की ज़मीन पर पहला हक़ जनता का है या पूँजीपतियों का?
  • क्या विकास सिर्फ़ बड़े उद्योगपतियों के लिए है या आम लोगों के लिए भी?

अगर नीतीश सरकार इन सवालों के जवाब नहीं देती, तो आने वाले चुनावों में जनता अपने वोट से ज़रूर हिसाब लेगी।