बार-बार लीक होते पेपर और बेरोज़गार युवाओं की जद्दोजहद

लहर डेस्क
देहरादून की सड़कों पर हाल ही में गूंजते नारे—“पेपर चोर, गद्दी छोड़”—सिर्फ़ विरोध की आवाज़ नहीं, बल्कि उत्तराखंड के लाखों बेरोज़गार युवाओं की टूटी उम्मीदों और गहराती निराशा का प्रतीक हैं।
हर साल दोहराई जाने वाली कहानी।
उत्तराखंड में सरकारी नौकरियों के लिए होने वाली परीक्षाएँ अब परीक्षा कम और खेल ज़्यादा लगने लगी हैं।
- 2021 में पटवारी/लेखपाल भर्ती परीक्षा लीक हुई।
- 2022 में UKSSSC स्नातक स्तर की परीक्षा धांधली के कारण रद्द हुई, 50 से ज़्यादा गिरफ्तारियाँ हुईं।
- 2023 में फॉरेस्ट रेंजर भर्ती का पेपर लीक हुआ।
- 2024 में सहायक लेखाकार परीक्षा पर सवाल उठे।
- और अब 2025 में एक बार फिर वही कहानी, वही धोखा।
हर बार कड़ी कार्रवाई और कड़े क़ानून के दावे होते हैं, मगर माफिया हर बार नया रास्ता निकाल लेते हैं।
ताज़ा विवाद।

इस साल 21 सितंबर को हरिद्वार में UKSSSC की स्नातक स्तर की परीक्षा चल रही थी। परीक्षा शुरू हुए 35 मिनट ही हुए थे कि सवालपत्र के तीन पन्ने मोबाइल पर बाहर भेज दिए गए।
मुख्य आरोपी—
- खालिद मलिक, जिसने जुराब में मोबाइल छिपाकर तस्वीरें निकालीं।
- उसकी बहन साबिया, जिसने आगे भेजीं।
- सुमन, सहायक प्राध्यापक, जिसने जवाब लौटाए।
- और पुराना नाम हकम सिंह रावत व पंकज गौड़, जिन पर ₹12 से 15 लाख में पास कराने का आरोप है।
आँकड़ों में बेरोज़गारों की तकलीफ़।
| वर्ष | परीक्षा | स्थिति | गिरफ्तार | प्रभावित अभ्यर्थी |
|---|---|---|---|---|
| 2021 | पटवारी/लेखपाल | रद्द | 35 | 40,000+ |
| 2022 | UKSSSC स्नातक स्तर | रद्द | 50+ | 1.2 लाख |
| 2023 | फॉरेस्ट रेंजर | रद्द | 22 | 25,000 |
| 2024 | सहायक लेखाकार | जाँच जारी | 12 | 15,000 |
| 2025 | UKSSSC स्नातक स्तर | विवादित | 5+ | 1.1 लाख |
इन पाँच वर्षों में तीन लाख से ज़्यादा युवाओं की मेहनत यूँ ही मिट्टी में मिल गई।
युवाओं की आवाज़।

रुड़की का राहुल चौहान कहता है कि “चार साल से तैयारी कर रहा हूँ। हर बार कोई माफिया हमारी मेहनत चुरा लेता है। अब भरोसा किस पर करें?”
हल्द्वानी की प्रियंका बिष्ट बताती हैं कि “हमारे गाँव की 12 लड़कियाँ इस बार परीक्षा में गई थीं। अब सब कहती हैं कि उत्तराखंड में मेहनत का कोई मतलब नहीं।”
देहरादून का मोहित बिष्ट कहता है कि “हर बार पेपर कैंसिल होता है, और हम उम्र सीमा पार करने के करीब पहुँच जाते हैं। यह नौकरी नहीं, ज़िंदगी का सवाल है।”
संगठित “पेपर माफिया”
जाँच एजेंसियों के मुताबिक, हर उम्मीदवार से सफलता की कीमत ₹10 से 15 लाख तक वसूली जाती है। 2022–23 में ही ED ने ₹3.5 करोड़ की संपत्ति ज़ब्त की।
विशेषज्ञ डॉ. बलराज नेगी का कहना है कि “यह सिर्फ़ अपराधियों का खेल नहीं। इसमें दलाल, अधिकारी और राजनीतिक संरक्षण की मिलीभगत है।”
सरकार और कानून।

2023 में राज्य ने उत्तराखंड प्रतिस्पर्धी परीक्षा अधिनियम लागू किया। इसमें 10 साल तक की सज़ा और भारी जुर्माने का प्रावधान है।
SIT का गठन भी हुआ, और कुछ आरोपियों की संपत्ति पर बुलडोज़र तक चला। मगर युवाओं की राय है कि “क़ानून कागज़ पर है, ज़मीन पर माफिया अब भी मज़बूत है।”
बेरोज़गारी और पलायन।
CMIE के आँकड़े बताते हैं कि उत्तराखंड की बेरोज़गारी दर 2024–25 में 11.2% थी। सबसे ज़्यादा प्रभावित युवा वर्ग है।
गाँवों से लगातार पलायन हो रहा है। अल्मोड़ा की नीलम रावत कहती हैं कि “हमारे गाँव के लड़के-लड़कियाँ देहरादून जाकर तैयारी करते हैं। लेकिन बार-बार परीक्षा रद्द होने से सबका मन टूट रहा है। अब बाहर मज़दूरी करना मजबूरी है।”
राजनीतिक गहमागहमी।
विपक्ष कांग्रेस और आम आदमी पार्टी सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि “पेपर माफिया को संरक्षण मिल रहा है।”
सरकार की ओर से जवाब—SIT, गिरफ्तारियाँ, कानून और बुलडोज़र कार्रवाई।
मगर जनता का सवाल वही है कि “क्या सिर्फ़ गिरफ्तारियाँ काफी हैं?”
रास्ता कहाँ से निकलेगा?
- तकनीकी सुधार – जैमर, CCTV, बायोमेट्रिक
- स्वतंत्र एजेंसी – आयोग से अलग नई संस्था
- तेज़ न्याय – फास्ट-ट्रैक कोर्ट
- विश्वास बहाली – युवाओं से संवाद
उम्मीद या हताशा?
उत्तराखंड के बेरोज़गार युवा सिर्फ़ नौकरी नहीं, बल्कि सम्मान और भरोसा चाहते हैं। बार-बार पेपर लीक सिर्फ़ उनकी पढ़ाई और मेहनत पर नहीं, बल्कि राज्य की छवि पर भी धब्बा है।
जब तक संगठित माफिया पर निर्णायक प्रहार नहीं होता, तब तक हर नया क़ानून और हर नई SIT बस टूटी उम्मीदों पर मरहम भर होगी।