स्थानीय फलों में छिपा लंबी उम्र का राज़

खट्टे-मीठे फलों का खज़ाना
पुरखा राम पवार, बज्जू, बीकानेर
राजस्थान के पश्चिमी रेगिस्तान की कठोर ज़मीन और तपती हवाएँ जीवन को कठिन बना देती हैं। लेकिन यही धरती हमें ऐसे फल और वनस्पतियाँ भी देती है जो हमारे जीवन को सेहत और सुरक्षा प्रदान करते हैं। जिस तरह माँ अपने बच्चे को बाहों में भरकर उसकी रक्षा करती है, उसी तरह ये खट्टे-मीठे फल और पौधे हमारे स्वास्थ्य के रखवाले हैं। गाँव के बुज़ुर्ग अक्सर कहते हैं। “पेड़ हमारे साथी हैं, फल हमारी दवा हैं और परंपरा हमारी ताक़त है।” यह केवल कहावत नहीं, बल्कि अनुभव है जिसे विज्ञान भी अब स्वीकार कर रहा है।
आंवला: अमृत तुल्य फल।
परंपरा की नज़र से देखा जाए तो आंवला हमारे यहाँ सिर्फ फल नहीं, एक आशीर्वाद है। बुज़ुर्ग कहते हैं कि जो व्यक्ति आंवला खाता है, उसे बुढ़ापा देर से आता है। गाँवों की महिलाएँ सर्दियों में आंवले का मुरब्बा बनाकर रखती हैं ताकि साल भर बच्चे से लेकर बूढ़े तक इसका लाभ ले सकें। बालों पर आंवले का तेल और चेहरे पर आंवले का लेप लगाने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। आंवले को धार्मिक महत्व भी दिया गया है। आंवला नवमी का पर्व इसी मान्यता का प्रतीक है। इस दिन महिलाएँ आंवले के पेड़ की पूजा करती हैं और इसे दीर्घायु का प्रतीक मानती हैं।

विज्ञान की नज़र से।
आंवला विटामिन C का सबसे बड़ा स्रोत है। 100 ग्राम आंवले में लगभग 600–700 मिलीग्राम विटामिन C पाया जाता है, जो संतरे की तुलना में 20 गुना ज़्यादा है। इसमें मौजूद पॉलीफेनॉल और एंटी ऑक्सीडेंट्स शरीर की कोशिकाओं को फ्री रेडिकल्स से बचाते हैं। आधुनिक शोध बताते हैं कि आंवला हृदय रोगों के जोखिम को कम करता है, कोलेस्ट्रॉल संतुलित करता है और मधुमेह रोगियों के लिए फायदेमंद है। यह इम्यून सिस्टम को मज़बूत करता है और संक्रमणों से बचाता है।
नींबू, संतरा और मौसमी: स्वाद और सेहत का संगम।
हमारी परंपरा यह है कि गर्मी में नींबू पानी का एक गिलास ठंडक ही नहीं, ताज़गी भी देता है। गाँवों में शादी-ब्याह में नींबू शरबत परोसना मेहमाननवाज़ी का हिस्सा है। संतरा बच्चों की सर्दियों की मिठास है और मौसमी का रस खेत-खलिहान से लौटे मज़दूरों की प्यास बुझाने वाला पेय।
विज्ञान की नज़र से।

नींबू और संतरे में विटामिन C भरपूर होता है, जो शरीर को स्कर्वी जैसे रोगों से बचाता है।
चिकित्सकों के अनुसार, लगातार 10 दिन तक नींबू का रस पीने से शरीर में विटामिन C की कमी नहीं रहती।
मौसमी का रस शरीर को हाइड्रेट करता है, पाचन सुधारता है और रक्त को साफ़ करने में मदद करता है।
बेर: बच्चों का चहेता और स्वास्थ्य का साथी।
राजस्थान के गाँवों में बच्चे खेत से लौटते समय बेर तोड़कर खाने का आनंद लेते हैं। मेलों और हाट-बाज़ारों में बेर बेचना आज भी आम दृश्य है। सर्दियों में सूखे बेर का उपयोग चटनी और अचार बनाने में किया जाता है।
विज्ञान की नज़र से।
बेर में आयरन और कैल्शियम होता है, जो खून की कमी को दूर करता है।
यह पाचन में सुधार करता है और कब्ज़ से राहत दिलाता है।
इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर को रोगों से लड़ने की क्षमता देते हैं।
खेजड़ी और सांगरी: रेगिस्तान की जीवनरेखा।

राजस्थान की पहचान सांगरी की सब्ज़ी से है। शादी-ब्याह या त्योहारों पर पंचकुटी की थाली अधूरी मानी जाती है यदि उसमें सांगरी न हो। खेजड़ी के पेड़ को गाँवों में जीवनदाता कहा जाता है।
विज्ञान की नज़र से।
सांगरी में प्रोटीन और मिनरल्स प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
खेजड़ी की छाल बुखार और पाचन रोगों में औषधि के रूप में काम आती है।
यह वृक्ष मिट्टी को उपजाऊ बनाता है और मरुस्थलीय पारिस्थितिकी को संतुलन देता है।
कुमठा और करोंदा: भूले-बिसरे लेकिन बेमिसाल।
कुमठा के फल हमारे गाँवों में नाश्ते का हिस्सा रहे हैं। राजस्थान में करोंदे की चटनी गर्मियों में ठंडक पहुँचाने वाली मानी जाती है।
विज्ञान की नज़र से।
कुमठा हृदय रोगों में सहायक माना जाता है।
करोंदा विटामिन C से भरपूर है और गर्मियों में शरीर को ठंडक देता है।
इन फलों में पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट शरीर को लंबे समय तक स्वस्थ रखते हैं।
परंपरा और विज्ञान का संगम।

बुज़ुर्गों की मान्यता रही है कि अगर कोई व्यक्ति इन खट्टे-मीठे फलों और पौधों का नियमित सेवन करे, तो वह सौ साल तक स्वस्थ जीवन जी सकता है। आज विज्ञान भी इस बात को मानता है कि इन देशज पौधों में मौजूद विटामिन, खनिज और एंटीऑक्सीडेंट हमारे शरीर को गंभीर बीमारियों से बचाते हैं।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया है कि स्थानीय और देशज फसलें जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में सबसे कारगर हैं। राजस्थान की रेतीली मिट्टी में उगने वाले ये पौधे इसी का जीवंत उदाहरण हैं।
जीवनशैली में उपयोग।

सुबह खाली पेट आंवले का जूस पीना।
नींबू का रस गुनगुने पानी में डालकर पीना।
बेर और करोंदे की चटनी भोजन के साथ।
सांगरी और कुमठा की सब्ज़ी नियमित भोजन में।
ये सब न केवल स्वास्थ्यवर्धक हैं बल्कि हमारी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़े हुए हैं।
परंपरा की छाँव में विज्ञान का सत्य।
राजस्थान के गाँवों में पाए जाने वाले खट्टे-मीठे फलों और वनस्पतियों की परंपरा केवल स्वाद या रीति-रिवाज़ तक सीमित नहीं है। यह वास्तव में एक वैज्ञानिक जीवनशैली है। आंवला, नींबू, बेर, सांगरी और अन्य देशज फल हमारे शरीर को स्वस्थ रखते हैं, हमारी इम्यूनिटी को बढ़ाते हैं और हमें लंबा जीवन जीने की शक्ति देते हैं। हमारे पूर्वजों की यह धरोहर हमें बताती है कि प्रकृति के साथ तालमेल ही असली स्वास्थ्य मंत्र है। आज ज़रूरत है कि हम इस परंपरा को अपनाएँ और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएँ।