धराली त्रासदी: एक आपदा, कई सवाल???


अनीस आर खान, नई दिल्ली

उत्तराखंड के उत्तरकाशी ज़िले का धराली गाँव, 5 अगस्त 2025 की सुबह, अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन की चपेट में आ गया। यह घटना सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि हिमालयी पारिस्थितिकी, जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित मानवीय गतिविधियों के बीच के जटिल संबंधों को भी उजागर करती है।

सुबह-सुबह अचानक आई बाढ़ और मलबे के सैलाब ने गाँव में तबाही मचा दी। देखते ही देखते, तेज़ पानी की धारा ने मकानों, दुकानों और खेतों को बहा दिया। स्थानीय बाज़ार, जो गाँव की अर्थव्यवस्था की रीढ़ था, घंटों में मलबे के ढेर में तब्दील हो गया।
जनहानि और विस्थापन । इस भयावह त्रासदी में आधिकारिक तौर पर कम से कम 10 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 20 से ज़्यादा लोग अभी भी लापता हैं। लापता लोगों की तलाश के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन लगातार जारी है। इस आपदा के कारण लगभग 50 परिवार बेघर हो गए हैं, जिनके पास अब सिर पर छत तक नहीं बची है। इन परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर बनाए गए अस्थायी राहत शिविरों में रखा गया है।

संभावित कारण: बादल फटना या कुछ और?
प्रारंभिक जाँच में इस घटना का मुख्य कारण बादल फटना (Cloudburst) बताया जा रहा है। हालाँकि, विशेषज्ञ और वैज्ञानिक इसके पीछे के अन्य संभावित कारणों पर भी गहन अध्ययन कर रहे हैं। ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF): ग्लेशियरों के पिघलने से बनी झीलें अस्थिर हो जाती हैं और उनके अचानक टूटने से बड़ी मात्रा में पानी और मलबा नीचे की ओर आ सकता है। ग्लेशियर का टूटना: जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों की स्थिरता लगातार घट रही है, जिससे उनके अचानक ढहने की संभावना बढ़ गई है।

भूस्खलन: पहाड़ी ढलानों पर होने वाला बेतरतीब निर्माण, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और सड़कों के विस्तार ने मिट्टी की पकड़ को कमज़ोर कर दिया है। इससे भारी बारिश के दौरान भूस्खलन का ख़तरा कई गुना बढ़ जाता है।
राहत और बचाव कार्य जारी

घटना के तुरंत बाद, सेना की इबेक्स ब्रिगेड, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF), राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) और अन्य राज्य आपदा प्रबंधन दल तुरंत मौके पर पहुँचे। अब तक, 1,500 से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया जा चुका है। दुर्गम पहाड़ी इलाक़ों और लगातार हो रही बारिश के कारण बचाव कार्य में कई चुनौतियाँ आ रही हैं। अस्थायी राहत शिविरों में विस्थापित परिवारों को भोजन, पानी, चिकित्सा सहायता और अन्य आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं।

स्थानीय जीवन पर गहरा असर
धराली का बाज़ार पूरी तरह से नष्ट हो गया है, जिससे स्थानीय व्यापार और अर्थव्यवस्था को भारी झटका लगा है। किसानों की फसलें और सेब के बागान भी बह गए हैं, जिससे आने वाले समय में उनकी आजीविका का संकट गहरा गया है। इस त्रासदी ने बच्चों की शिक्षा, महिलाओं के रोज़गार और वृद्धों की देखभाल जैसी बुनियादी ज़रूरतों पर भी गहरा असर डाला है।
यह घटना हमें याद दिलाती है कि हिमालयी क्षेत्र एक बेहद संवेदनशील और नाज़ुक पारिस्थितिकी वाला इलाक़ा है। अंधाधुंध सड़क निर्माण, बड़े बाँध प्रोजेक्ट और अनियंत्रित पर्यटन जैसी गतिविधियाँ यहाँ की प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ रही हैं, जिससे ऐसी आपदाओं की संभावना बढ़ रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून के बदलते पैटर्न और चरम मौसमी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति ने इस समस्या को और भी जटिल बना दिया है।

धराली की त्रासदी सिर्फ़ एक गाँव की कहानी नहीं है, बल्कि यह पूरे हिमालयी क्षेत्र में बसे लाखों लोगों के लिए एक चेतावनी है। आपदा प्रबंधन की बेहतर योजनाएँ, सुरक्षित निर्माण नीति और पर्यावरण संरक्षण—ये तीनों ही पहाड़ी इलाक़ों के भविष्य की कुंजी हैं। अगर हम अभी भी नहीं चेते, तो आने वाले वर्षों में ऐसी घटनाएँ और भी ज़्यादा विनाशकारी साबित हो सकती हैं।