जब जमुई -बिहार की माटी जागती है: रंजन कुमार की आवाज़ के साथ

लेखक – राजीव रंजन

सुबह की पहली किरणें जब  बिहार राज्य के जमुई जिले के गिद्धौर प्रखंड के खेतों पर पड़ती हैं, और बांस की झोपड़ियों से धुएं की लकीरें उठती हैं, तब गिद्धौर प्रखंड के एक छोटे से गांव में एक साइकिल की धीमी चिर्र-चिर्र सुनाई देती है।ओस से भीगे पत्तों से टपकती धूप जैसे उम्मीद की एक किरण ले आती है।

यही वह समय है जब रंजन कुमार अपनी पुरानी सी साइकिल पर झोला लटकाए निकलते हैं — न खेत में काम करने, न बाजार जाने, बल्कि आवाज़ बनने। किसी और की, किसी उस औरत की जो बीड़ी बनाते-बनाते थक गई है, किसी उस बुज़ुर्ग की जो पेंशन का फॉर्म भरते-भरते निराश हो चुका है।

रंजन कुमार — कोई बड़ा विभागीय अधिकारी नहीं है, ना ही अख़बार के पन्नो पर आये दिन छाने वाले चेहरे  । वो एक साधारण किसान हैं। लेकिन उनकी सोच और उनके जज़्बे ने उन्हें गांव का वो चेहरा बना दिया है, जो हर घर की चिंता को अपनी ज़िम्मेदारी समझता है।

मोबाइल वाणी से जुड़ाव: एक नए अध्याय की शुरुआत

अक्टूबर 2014 से रंजन कुमार ने मोबाइल वाणी के साथ एक स्वयंसेवक के रूप में अपना कार्य शुरू किया। यह सामुदायिक मीडिया का काम था, जो तब समाज के लिए नया था। रंजन बताते हैं कि शुरुआत में लोग इसे मज़ाक समझते थे और तरह-तरह की आलोचनाएं करते थे। “लोग सोचते थे, ये क्या नया काम है,” रंजन याद करते हुए कहते हैं, “पर मैंने हार नहीं मानी। मैं हमेशा समाज के बीच जाता रहा, और महिलाओं व पुरुषों को अपनी बात खुद बोलने के लिए प्रेरित करता रहा।”

इस कार्य के लिए रंजन प्रखंड के हर गांव के वार्डों में जाकर सामुदायिक बैठकें करते थे। इन बैठकों में वे लोगों को मोबाइल वाणी के निशुल्क नंबर पर मिस कॉल के माध्यम से कार्यक्रम सुनने और अपनी समस्याओं को रिकॉर्ड करवाने के लिए प्रेरित करते थे। यह सिलसिला आज भी जारी है, और इसके परिणाम स्वरूप गिद्धौर प्रखंड में बड़ा सामाजिक परिवर्तन देखने को मिल रहा है।

शुरुआत में लोगों ने मज़ाक उड़ाया।

“रिकॉर्डिंग से क्या होगा? सरकार सुनेगी क्या?”

लेकिन रंजन चुप नहीं हुए। 

उन्होंने गांव-गांव, वार्ड-वार्ड जाकर महिलाओं और पुरुषों को सिखाया —

“अपनी कहानी खुद सुनाओ। अपनी पीड़ा खुद रिकॉर्ड करो।”

मोबाइल वाणी के निशुल्क नंबर पर मिस कॉल देने और अपनी बात रिकॉर्ड करने की प्रक्रिया ने धीरे-धीरे गांव के हर कोने में जगह बना ली।

आज रंजन कुमार के प्रयास से 6000 से अधिक लोग जागरूक हो चुके हैं।

बीड़ी श्रमिकों के लिए संघर्ष और सफलता

जमुई जिला बीड़ी उद्योग के लिए जाना जाता है, जहाँ की लगभग 80% महिलाएं बीड़ी बनाने के काम से जुड़ी हैं। लेकिन दुखद यह था कि इनमें से अधिकांश के पास बीड़ी श्रमिक कार्ड नहीं थे, जिससे उन्हें सरकारी सुविधाओं से वंचित रहना पड़ता था। उसने बीड़ी बनाने वाली सैकड़ों महिलाओं की समस्याओं को मोबाइल वाणी के जरिए प्रशासन तक पहुंचाया।

रंजन कुमार और मोबाइल वाणी की टीम ने इस समस्या को प्रमुखता से उठाया। सामुदायिक बैठकों के बाद, महिलाएं अपनी समस्याओं को रिकॉर्ड करती थीं, और मोबाइल वाणी के स्वयंसेवक उनके समाधान के लिए पंचायत प्रतिनिधियों और संबंधित अधिकारियों से बात करते थे। इस प्रयास का नतीजा यह हुआ कि । पहले उन्हें प्रति हजार बीड़ी के लिए 75 रुपये मिलते थे, जिसे मोबाइल वाणी के प्रयासों से बढ़ाकर आज 130 रुपये प्रति हजार कर दिया गया है। 200 से अधिक महिलाओं को श्रमिक कार्ड मिला। और साथ ही अब उन्हें  मुफ्त दवाइयां भी मिल रही हैं।   यह एक बड़ी जीत थी जिसने सैकड़ों परिवारों के जीवन को बेहतर बनाया।

पेंशन, पौधे और पंचायत तक परिवर्तन

रंजन की सामुदायिक बैठकों ने सिर्फ श्रमिकों को नहीं, बुज़ुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगों को भी आवाज़ दी। सैकड़ों लोगों को पेंशन योजनाओं से जोड़ा गया।

मनरेगा योजना के तहत 10 किसानों ने नरम योजना के अंतर्गत 2000 पौधे लगाए, और हर महीने ₹1800 की सहायता पा रहे हैं।

‘आपका मुखिया कैसा हो’ जैसे कार्यक्रमों के ज़रिए जब ग्रामीणों ने नेतृत्व पर सवाल उठाया, तो रतनपुर पंचायत का मुखिया भी बदल गया।

यह बदलाव सिर्फ कागज़ों में नहीं, सोच में दर्ज हुआ।

सरकारी योजनाओं का लाभ और सशक्त ग्रामीण समाज

रंजन कुमार और मोबाइल वाणी हर महीने सामुदायिक बैठकें आयोजित कर महिलाओं और पुरुषों को सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं की जानकारी देते हैं। इसके चलते 6000 से अधिक महिला और पुरुष जागरूक हुए हैं, और किसान भी इन योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं। गिद्धौर प्रखंड के 10 ऐसे किसान हैं जिन्होंने मनरेगा योजना के तहत अब तक 2000 पौधे लगाए हैं और उन्हें प्रतिमाह 1800 रुपये का भुगतान भी मिल रहा है।

इसके अतिरिक्त, मोबाइल वाणी के माध्यम से वृद्धावस्था पेंशन, दिव्यांग पेंशन और विधवा पेंशन जैसी योजनाओं के तहत सैकड़ों महिला और पुरुष लाभान्वित हुए हैं। मोबाइल वाणी पर चलाए गए एपिसोड ‘आपका मुखिया कैसा हो’ ने तो रतनपुर पंचायत के मुखिया पद पर भी परिवर्तन ला दिया, जो सामुदायिक मीडिया की ताकत का एक बड़ा उदाहरण है।

रंजन कुमार कहते हैं, “आज गांव और समाज की महिलाएं किसी भी प्रकार की कोई परेशानी होने पर खुद मोबाइल वाणी पर अपनी बात रिकॉर्ड करती हैं।” यह इस बात का प्रमाण है कि रंजन कुमार जैसे साधारण व्यक्ति के असाधारण प्रयासों से कैसे ग्रामीण बिहार में एक नई चेतना और सशक्तिकरण की लहर आई है।

एक नई सुबह की शुरुआत

अब गिद्धौर की गलियों में जब कोई महिला कहती है —

“हम अपनी बात मोबाइल वाणी पर बोल देले बानी…”

तो वो डर नहीं, सशक्तिकरण की आवाज़ होती है।

रंजन कुमार ने अपने जीवन की दिशा केवल खेतों तक सीमित नहीं रखी।

उन्होंने एक ऐसा रास्ता चुना जहाँ से होकर गुज़रती हैं उम्मीदें, संघर्ष और बदलाव की कहानियां।